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इस्लाम के तथ्य जिन्हें पढ़कर हर कोई हो जाता है दंग..

इस्लाम इन दिनों मीडिया में सुर्ख़ियां बटोर रहा है लेकिन किसी वजह से नहीं बल्कि आतंकवाद की वजह से। ISIS, अल-क़ायदा और बोकोहरम जैसे जैसे आतंकी हमलों से बेगुनाहों का ख़ून बहाते जा रहे हैं वैसे-वैसे इस्लाम को लेकर लोगों की घ़लत धारणाओं को बल भी मिलता जा रहा है। इस्लाम के प्रति लोगों की अज्ञानता में इन हमलों ने आग में घी का काम किया है। इसकी वजह से ग़ैर-मुस्लिम देशों में मुस्लिम समुदाय को नफ़रत और भय का माहौल झोलना पड़ रहा है।

ISIS, अल-क़ायदा और बोकोहरम जैसे कुछ ऐसे कट्टरपंथी संगठन हैं जो इस्लाम की ग़लत व्याख्या कर लाखों युवाओं को गुमराह कर रहे हैं। आज दुनियां में 160 करोड़ मुसलमान हैं और ये आतंकी संगठन इसका मात्र 00.03 प्रतिशत ही हैं। सच्चाई ये है कि अन्य धर्मों की तरह इस्लाम भी न सिर्फ इंसानियत और भाईचारे की बल्कि समाजवाद की भी वक़ालत करता है।


इस्लाम से जुड़ी ऐसी दिलचस्प बातें जिन्हें जानकर हो सकता है आप हैरान हो जाएं।
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> इस्लामिक उग्रवाद हाल ही की उपज है-

आम धारमा के विपरीत इस्लाम दकियानूसी मज़हब कतई नही है बल्कि ये दूसरे धर्मों का सम्मान करना सिखाता है। आपको जानकार हैरानी होगी कि इस्लाम उल चंद गर्मों में से है जिसने विज्ञान को बढ़ावा दिया था। दुर्भाग्य ये है कि इस्लामिक विश्व में बढ़ते धार्मिक कट्टरपन की वजह से लोगों की ये धारणा बनती जा रही है कि इस्लाम कट्टरपंथ की हिमायत करता है। इस्लाम में कट्टरपंथी 50 के दशक से अपने पैर पसारने लगे थे।

> दुनियां की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी की स्थापना एक मुस्लिम महिला ने की थी-

इस्लाम को हमेशा से दकियानूसी और महिलाओं से नफ़रत रखने वाला धर्म माना जाता रहा है लेकिन ये ग़लत है क्योंकि इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जो इस अवधारणा को ग़लत साबित करते हैं। ऐसा ही एक अदाहरण है मोरक्को में अल-कराऔने यूनिवर्सिटी जिसकी स्थापना फ़ातिमा अल-फ़िहरी ने की थी जो एक अमीर व्यापारी की बेटी थीं। इस यूनिवर्सिटी में धर्म के अलावा अलंकार और खगोल विद्या जैसे विषय भी पढ़ाए जाते थे। कहा तो ये भी जाता है कि ये पहली यूनिवर्सिटी थी जो शैक्षिक डिग्रियां देती थी।

> पहली बार 9वीं सदी में इस्लाम ने विकास के सिद्धांत को आगे बढ़ाया था.-

हमेशा से धर्म और विज्ञान में ठनी रही है लेकिन दिलचस्प बात ये है कि जब इस्लामिक साम्राज्य अपने चरम पर था तब वैज्ञानिकों का बहुत सम्मान होता था। मानव विकास के सिद्धांत को अल-जाहिज़ नाम के मज़हबी मुसलमान वैज्ञानिक ने 9वीं सदी में और आगे बढ़ाया था।

> क़ुरान में पैग़ंबर मोहम्मद saw से पांच बार ज्यादा ज़िक्र है ईसा a.s. मसीह का-

इस्लाम में ईसा मसीह को महान पैग़बरों में से एक माना जाता है हालंकि उन्हें ईश्वर की संतान नहीं माना जाता जैसी की ईसाइयों की मान्यता है।

> इस्लाम धर्म सिर्फ़ पूर्वी देशों तक सीमित था?

- ये आम धारणा है कि इस्लाम धर्म काफी लंबे समय तक पश्चिम देशों में आया ही नहीं था और ये सिर्फ पूर्वी देशों तक ही सीमित था। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। इस्लाम शताब्दियों से यूरोपीय इतिहास का केंद्रीय हिस्सा रहा है। स्पेन में स्पेनिश संगठनों द्वारा उखाड़ फ़ेंके जाने के पहले 700 सालक तक मुस्लिम शासन रहा। दक्षिणपूर्व (बाल्कन) देशों में भी भारी संख्या में मुसलमानों की मौजूदगी रही है और आज भी है। स्कॉलर डेविड अबुलाफ़िया के अनुसार ''मध्यकालीन यूरोप और इस्लाम के बीच संबंधों के इतिहास को दो दुनिया के संबंध के इतिहास के रुप में देखना बुनियादी ग़लती होगा।
एक अन्य स्कॉलर तारिक़ रमज़ान का कहना है कि यूरोप में रहने वाले मुसलमानों को विदेशी की तरह देखना बंद करना चाहिये। “ नागरिकता के लिहाज़ से मैं स्विस हूं, मेरी संस्कृति यूरोपीय है, मेरी विरासत मिश्र है, धर्म के लिहाज़ से मैं मुसलमान हूं और मेरे सिद्धांत सार्वभौमिक हैं।”

> आत्मघाती हमलावर शहीद नहीं पापी हैं-

बदन पर बारुद बांधकर बेगुनाहों को मारना इस्लाम में अपराध है। ये विडंबना ही है कि कुछ लोग इस कृत्य को सही ठहराते हैं। वे दरअसल एक नहीं दो पाप कर रहे होते हैं। लगभग सभी मुस्लिम स्कॉलर्स ने आत्मघाती हमलों को ग़ैर-इस्लामिक बाताया है। 2013 में अफ़ग़ान सरकार ने एक सेमीनार किया था जिसमें सऊदी अरब के प्रमुख मुफ़्ती सहित सभी स्कॉलरों ने इस कृत्य की आलोचना की थी।
मशहूर स्कॉलर रॉबर्ट पैप ने अपनी किताब डाइंग टू विन: द स्ट्रेटेजिक लॉजिक ऑफ़ सुसाइड टेरोरिज़्म, में लिखा है कि आत्मघाती हमला करने वाले धर्म से नहीं बल्कि राजनीतिक और राष्ट्रवाद के उद्देश्य से प्रेरित रहते हैं। पैप का ये भी कहना है कि आत्मघाती हमले के तरीक़े सिर्फ़ मुसलमानों ने ही नहीं बल्कि श्रीलंका में तमिल टाइगर्स और टर्की में PKK ने भी अपनाएं हैं।




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