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ख्वानी बाज़ार हत्याकांडः पठानों की शहादत का वह बाब जिसे देश की आज़ादी के इतिहास में कोई जगह नहीं मि

मोहम्मद उमर

यह घटना उस समय की है जब पाकिस्तान, भारत का हिस्सा हुआ करता था और अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ पूरा भारत एक साथ खड़ा था आज़ाद वतन की सोच लेकर! उस समय नमक आन्दोलन को लेकर महात्मा गांधी ने एक विद्रोह छेड़ रखा था जिसके कारण ब्रिटिश सरकार ने गांधी जी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।

इसके बाद गांधी वादी नेता “खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमान्त गांधी)” ने अंग्रेज़ो की इस तानाशाही का जमकर विरोध किया और इसी विरोध में पेशावर (वर्तमान पाकिस्तान) के पठान हज़ारों की तादाद में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ इकट्ठा हुए जिससे घबराकर अंग्रेज़ी सेना ने पेशावर से भाग निकली और दो दिन बाद अतिरिक्त सैन्य शक्ति के साथ वापस पेशावर पहुँची और गाँधीवादी नेता खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमान्त गाँधी) को अंग्रेज सरकार की आलोचना करने वाले भाषण देने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया!

23 अप्रैल 1930 को पेशावर में इसी विरोध के चलते पश्तून के पठानो द्वारा शांति पूर्वक जुलूस निकाला गया जो पेशावर की गलियों से गुज़रता हुआ “किस्सा–ख्वानी बाज़ार” के चौराहे पर पहुंचा, चौराहे पर ब्रिटिश कर्नल दो प्लाटून सेना लिए खड़ा था जिसने जूलूस को देखते ही फायरिंग का आदेश दे दिया,जिसमे सैकड़ों पठानो के साथ साथ जुलूस में शामिल मासूम बच्चे भी अंग्रेज सिपाहियों की गोलियों के शिकार हुए! नोबल पुरस्कार विजेता इतिहासविज्ञ जीन शार्प इस घटना पर लिखते है कि “किस्सा ख्वानी बाज़ार” में अंग्रेज़ो द्वारा 6 घंटे तक लगातार फायरिंग हुई!

भारतीय आंकडों के अनुसार लगभग 400 से अधिक इंसान इस घटना में शहीद हुए,अंग्रेजों ने इस हत्याकांड की लीपा पोती करने की भरपूर कोशिश की जिसमे शहीद हुए इंसानो की संख्या को कम बताकर यह कहानी तैयार की गई कि जुलूस ने सेना पर पत्थरबाज़ी की फिर हमला किया, लेकिन सीमान्त गाँधी ने यह मुद्दा ब्रिटिश सम्राट तक उठाया जिसके कारण सम्राट जॉर्ज-6 ने इस घटना के न्यायिक जांच के आदेश दिए और लखनऊ के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस नैमतउल्लाह चौधरी को जांच अधिकारी नियुक्त किया!

किस्सा–ख्वानी बाज़ार हत्याकांड की जांच के दौरान ब्रिटिश सम्राट ने अंग्रेजों के पक्ष में फैसला देने हेतु जस्टिस नैमतउल्लाह चौधरी को ‘सर’, ‘नाइट’, ‘लॉर्ड’ आदि उपाधियों और सुविधाओं से विभूषित करना चाहा लेकिन जस्टिस नैमतउल्लाह चौधरी ने ब्रिटिश सम्राट द्वारा दी गयी सारी उपाधियां लौटा दीं,कुछ समय बाद उनकी रिपोर्ट आई जिसमें पेशावर की जनता को निर्दोष और ब्रिटिश सेना को हत्याकांड का दोषी करार दिया गया!

किस्सा–ख्वानी बाज़ार हत्याकांड” भी “जलिंया वाला बाग हत्याकांड” की तरह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महत्वपूर्ण घटना है, लेकिन अफसोस इस घटना को आज़ादी के इतिहास में कही छिपा दिया गया जिसको याद करना वाला आज कोई नहीं है।

(लेखक द ट्रूथ लाईन मैग्जीन के संपादक हैं)




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