All Categories


Pages


आज के दौर में एक मुसलमान ही दूसरे मुसलमान को नहीं जानता है: रवीश कुमार

मैं उत्तर प्रदेश चुनाव कवर करने नहीं गया। यह पहला चुनाव था जिसे मैंने छोड़ दिया। चुनाव शुरू होने के दो तीन महीने पहले से पूरे प्रदेश की ख़ाक छानने की योजना बनाता रहा लेकिन प्रथम दो चरणों के बाद घर बैठ गया। कुछ पारिवारिक कारण भी थे और अब मन भी नहीं करता है। मेरे अंदर एक पत्रकार के रूप में चुनाव को देखने समझने की भूख मिट चुकी है। मैं टीवी न के बराबर देखता हूँ इसलिए चुनाव से संबंधित दूसरों की रिपोर्टिग भी कम देखी और अख़बार भी न के बराबर पलटा। फेसबुक और ट्वीटर पर ज़रूर देखा कि किस तरह की ख़बरें चल रही हैं। फोन पर दूसरे पत्रकारों से बात करता रहा मगर मेरा अपना कोई आंकलन नहीं था। किसी का आंकलन ग़लत निकला और किसी का सही।

उत्तर प्रदेश इसलिए नहीं गया क्योंकि मेरे भीतर की चुनावी रिपोर्टिग थक गई है। मैं ख़ुद को एक और बार के लिए उसी फार्मेट में बंद नहीं करना चाहता था। वही जाति, वही धर्म और वही इनके प्रतिशत। वही राजतिलक और वही कौन बनेगा मुख्यमंत्री। डिबेट के नाम से ही घबराहट होने लगती है। चुनावी रिपोर्टिंग में नया करने की समझ नहीं बन पा रही थी। आप मुद्दों की जांच शुरू कीजिये तो बाकी जुमलों को लेकर ग़दर मचाये रहते हैं। जब नब्बे फीसदी दर्शक वर्ग वही भाषणबाज़ी देख रहा है तो कई बार ख़ुद के ग्राउंड रिपोर्ट की व्यर्थता नज़र आने लगती है। मैं फ़ाइल में क्लिपिंग सज़ा कर रखने के लिए काम नहीं करना चाहता। अपने किसी लेख की कतरन भी सहेज कर रखता। हाल फिलहाल के तमाम चुनावों में अब यह ज़ोर नहीं रहता है कि तथ्यों और दावों की जाँच की जाए। इटावा जाओ तो यादव से मिलो जैसे वहाँ कोई और बात ही नहीं। इस बार इसलिए भी इटावा नहीं गया। क्या आज़मगढ़ के यादव यादव नहीं हैं।

थोड़ा बहुत तो पंजाब और यूपी के लिए निकले मगर कुछ एपिसोड चुनावी रिपोर्टिंग के उसी पुराने पिंजड़े में फँस कर जाट या जाटव मतदाताओं को समझने लगा। जबकि सोच कर बैठा था कि इस बार ऐसे रिपोर्टिंग नहीं करूँगा। एक दो छोड़ दें तो हमने जितनी भी रिपोर्टिग की,मीडिया के बने बनाए फार्मेट से निकलने की कोशिश में की। बहुत हद तक हमने किया भी, मगर पता नहीं वो टीवी के एकरसीया माहौल में लोगों को पसंद आया भी या नहीं। या फिर उन्हें पसंद तो आया होगा मगर किसी काम का नहीं लगा होगा। लोग भी शायद डिबेट की गप्प देखना चाहते हैं जो हकीकत से दूर बातों की अवास्तविक हकीकत का निर्माण करता है।

चुनावी रिपोर्टिंग की यह बेचैनी कई चुनावों से बन रही है। हिन्दी का पत्रकार लगता है कि उत्तर भारत के लिए अभिशप्त है। आज तक कश्मीर नहीं गया। उड़ीसा नहीं गया। जाना मेरे बस की बात नहीं है। जब जाने का वक्त था तो तब मौके कम थे। अब संसाधन की चुनौती मेरे ही नहीं, सबके सामने है। खुद के जाने का मतलब है बाकी के मौके कम हो जाएंगे। मैं इस फितरत का हूं नहीं। ख़ुद को पीछे कर लेता हूं। टीवी को संसाधन की नज़र से भी देखना होगा। इसका आर्थिक पक्ष मुश्किल होता है। जब ऐसा नहीं था तब छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और गुजरात जाने का मौका मिला था। यहां चालीस चालीस दिन रहकर रिपोर्टिंग की थी। अब शायद ही किसी को ऐसा मौका मिले। नागपुर, अकोला, गढ़चिड़ौली, नाशिक जाकर तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। अब तो कहीं भी जाइये,टीवी का फार्मेट एक सा है। लोग भी समझ गए हैं। पत्रकार और जनता के संबंध टीवी से परिभाषित हो चुके हैं और फिक्स हो गए हैं। पहचाने जाने से शोहरत तो मिल गई मगर रिपोर्टिंग का एकांत चला गया। कई बार लगता है किसी ने बीच बाज़ार में जेब काट ली है। मेरा सुख छिन गया है। लोगों में घुलमिलकर उनसे बातें करना और नई नई कहानियों तक पहुंचने का सुख चला गया है। सेल्फी खींचाने की भीड़ और अब धक्का मुक्की, धमकी और गाली देने वालों की जमात ने फिल्ड में जाकर लोगों से बात करना मुश्किल कर दिया है। चेन्नई गया था, वहां एयरपोर्ट के बाहर किसी ने नहीं पहचाना।आराम से गलियों में घूमता रहा और चीज़ों को देखता रहा। मुझे ऐसा ही एकांत चाहिए। कब मैं फिर से अजनबी पत्रकार बन पाऊंगा।

लोकसभा से लेकर अब तक की मेरी चुनावी रिपोर्टिंग देखिये। मैं मीडिया के फिक्स फार्मेट और तय मुद्दों से अलग कुछ करने का प्रयास करता हूं। मगर वो धारा इतनी मज़बूत और बड़ी है कि आप उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाते हैं। जो मुझे भी पसंद करते हैं वो भी वही कचरा देखते रहते हैं। लोकसभा के अलावा दिल्ली और बिहार की मेरी रिपोर्टिंग आप देखेंगे तो कुछ को छोड़ सब अलग अलग दिखेंगी। बिहार की रिपोर्टिंग में लगेगा ही नहीं कि चुनाव कवर कर रहा हूँ। 2007 और 2012 में गुजरात गया था। किसी को मेरी सारी रिपोर्ट देखनी चाहिए निकालकर। 2007 में कितने शो किये थे। किसी में दंगा नहीं था। गुजरात था जिसके बारे में आज भी लोग नहीं जानते हैं। तब टीवी में अलग अलग करने की प्रतियोगिता सी होती थी। अब हर चैनल पर एक ही फार्मेट है। मुझे हर छह महीने साल भर के बाद उसी पुराने फार्मेट में रिपोर्ट करने से डर लगता है। प्रयोग करने की गुज़ाइश समाप्त होती जा रही है। इस फार्मेट में सिर्फ किसी दल या सरकार का ढिंढोरा ही पीटा जा सकता है। इन पर बाज़ार और सरकार का क़ब्ज़ा हो गया है। आप देखेंगे कि कई साल से चुनावी नतीजे के आसपास का फार्मेट एक सा ही है। पता नहीं दर्शक कैसे झेलता होगा या शायद उसे चालू फार्मेट ही समझ आते हैं।

हर चुनाव में पत्रकार जाति और धर्मानुसार मतदाता के मन को समझने की चुनौती उठा लेते हैं। नतीजा यह होता है कि मतदाता ख़ुद को व्यक्ति के तौर पर पेश नहीं करता,पत्रकार के सवाल पूछते ही वो अपने समुदाय के प्रतिनिधि नेता के तौर पर बोलने लगता है। जब वही मन की बात नहीं बताना चाहता तो पत्रकार क्यों उसके मन की बात जान लेने की ज़िद पर अड़े रहते हैं। नतीजा आने पर कई लोग छाती कूट रहे हैं कि मुझे क्यों नहीं पता चला। चालीस दिन घूमा लेकिन भनक नहीं लगी। कुछ पत्रकार अब तो यही जानने निकलते हैं कि फ़लाँ जगह मोदी लहर है या नहीं। जैसे मोदी लहर मापना भी एक नया बीट बन गया है।

पत्रकार को यह लोड क्यों लेना चाहिए। वो मतदाता का मन जानने जाता है या मुद्दों को समझने, रणनीति को देखने,चुनाव में हो रहे ग़लत सही को देखने। एक मतदाता तक कई पार्टियाँ कैसे पहुँचती हैं, पर्चे से लेकर भाषण तक किस तरह से असर करते हैं, क्या कोई इस तरह से देखने जानने का प्रयास कर रहा था। किसी की रिपोर्ट में आज तक नहीं दिखा कि संघ के कार्यकर्ता कैसे घर घर जाते हैं। वही जाते हैं या मार्केटिंग एजेंसी के लोग जाते हैं। कांग्रेस का दफ्तर नहीं है मगर वहाँ कांग्रेस का उम्मीदवार कैसे लड़ रहा है। हम सुनते हैं कि बीजेपी के सत्तर हज़ार कार्यकर्ता यूपी में गए थे। ये कहाँ रहते थे, क्या करते थे, इनकी संख्या के अलावा कुछ तो नहीं देखा। कितना कुछ गुप्त रह जाता है। ग़लत की रिपोर्टिग का साहस तो किसी में नहीं रहा। लोग अब किसी पत्रकार को अपनी पार्टी की पसंद के आधार पर देखते हैं। जनता को भी पत्रकारिता से वही उम्मीद है जो पार्टी से है। नेता के आगे पीछे पसंद वाले पत्रकार ही होते हैं। मैं जो लिख रहा हूँ वो बीजेपी की हार जीत से संबंधित नहीं है,न ही वो सिर्फ बीजेपी सापेक्षिक है। टीवी का फार्मेट चुभता है। जिनके हाथ में टीवी को बदलने का अधिकार और संसाधन है वो नक़ल से ज़्यादा कुछ करना नहीं चाहते।

चुनाव आते ही एक मतदाता कैसे जाति धर्म के पैकेज में बदल जाता है। कैसे वो इस पैकेज से बाहर निकलता है। किस तरीके की सूचनाएँ उसे पैकेजबंद करती हैं और किस तरह की सूचनाएँ आज़ाद करती हैं। क्या किसी रिपोर्टर ने जानने की कोशिश की या ये सब होते देखा। कई पत्रकार ढाबा देखकर ही लोटपोट हो जाते हैं जैसे सात जन्म में ढाबा न देखें हों। ढाबे के खाने की तस्वीरें ट्वीट करेंगे। गाँव वालों के साथ फोटो खींचा कर ट्वीट करेंगे। जैसे कोई पर्यटक आगरा ताज महल देखने जाता है मगर देखेगा पाँच मिनट लेकिन ताज महल के लघु रूप को ख़रीदने में एक घंटा लगायेगा। चुनाव शुरू होते ही अमित शाह का घंटा घंटा भर का इंटरव्यू शुरू हो जाता है। लखनऊ गए पत्रकार अखिलेश यादव का इंटरव्यू करने लगते हैं। एक ही चैनल के पाँच पत्रकार अखिलेश का इंटरव्यू कर रहे हैं। इंटरव्यू सवालों के जवाब के लिए नहीं होते क्योंकि बहुत कम में सवाल सवाल की तरह पूछे जाते हैं। कुल मिलाकर यह पैटर्न भी ऊब पैदा करता है। शायद दर्शक नहीं ऊबे हैं मगर मेरे भीतर की रचनात्मकता ये सब देखकर बैठ जाती है। मेरा कोई जजमेंट नहीं है कि ये करना ख़राब है या यही श्रेष्ठ है बल्कि मैं चट गया हूँ। ये चीज़ें मुझे आकर्षित नहीं करती हैं।

इसलिए इस बार हम जितना भी निकले, मैं उसमें यही जानने का प्रयास किया कि महिला मतदाता या आम मतदाता कैसे चुनाव के लिए अपनी मत बनाता है। मतदाता जानता है या उसे बताया जाता है? अफवाह की भूमिका है या अखबार की है? मतदाता की जागरूकता एक मिथक है। वो भी हमारे जीतना ही जानता और नहीं जानता है। उसके पास सरकार का कोई सारा रिकार्ड नहीं होता है। हर दल अपने तरीके से जनता को कंफ्यूज़ करते हैं। कुछ योजनाओं को लेकर उसके व्यक्तिगत अनुभव होते होंगे।बाकी सब सुनी सुनाई बातों के आधार पर राय बनाता है। कोई निश्चित जवाब तो नहीं मिला लेकिन चार पाँच एपिसोड में यही जानने का प्रयास किया कि उसके जनमत का आधार क्या है? क्या वाक़ई वो सरकार के कामकाज़ के आधार पर ही बनाता है और इसके लिए किन माध्यमों पर भरोसा करता है। यही देखा कि टीवी सबके लिए आसान माध्यम है। टीवी का प्रोपेगैंडा वह ख़बर के रूप में स्वीकार कर रहा है। यह भी पता चला कि मतदाता को जानने समझने के हमारे फार्मेट बेकार हो चुके हैं या उसके अलावा भी कुछ है जो हम नहीं जानते।

हमने जितनी भी रिपोर्टिंग की, एक में भी मुस्लिम मतदाता के मन को समझने का प्रयास नहीं किया और इसके लिए देवबंद और अलीगढ़ यूनीवर्सिटी नहीं गए। मेरा मानना है कि भारत की राजनीति में ए एम यू की कोई भूमिका नहीं है। ए एम यू के लोग अपनी सारी भूमिका ओल्ड ब्वायज़ एसोसिएशन बनाने में ही खपा देते हैं। मुसलमान मतदाता का मन न तो ए एम यू बनाता है न देवबंद। मुझे समझ नहीं आता कि कैसे बनारस का मतदाता हिन्दू मतदाता बताया जाने लगता है। वो अन्य कारणों से भी तो मोदी को पसंद कर सकता है। आज के दौर में एक मुसलमान ही दूसरे मुसलमान को नहीं जानता है। वो बीजेपी से नहीं लड़ रहा था। कितने सारे दलों में वो ख़ुद से लड़ रहा था। लेकिन पत्रकार मुसलमानों की राजनीतिक महत्वकांक्षा को बीजेपी के संदर्भ में परखने में लगे थे जबकि मुसलमान मतदाता काउंसिल से लेकर तंजीम के पीछे लगा रहा। मैं पहले के चुनावों में दोनों जगहें जाता था लेकिन लोकसभा के समय से बंद कर दिया। बल्कि प्राइम टाइम के एक एपिसोड में बोला भी कि चुनावी रिपोर्टिंग में कुछ शहरों और इदारों को ख़ास ओहदा हासिल है। किस वजह से है, समझ नहीं आया। उसी तरह हिन्दू वोट को समझने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे मुहावरों को छोड़ देना चाहिए। मतदाता के भीतर की धार्मिक पहचान किसी और तरीके से बनती है। मंच के भाषणों से सिर्फ इशारा किया जाता है। असली खेल ज़मीन पर होता है जिसकी हमें कोई जानकारी नहीं होती है। सब चुनाव के बाद पता चलता है।

मुझे टीवी मीडिया की चुनावी रिपोर्टिग समझ नही आती है। मीडिया जिस अनुभव संसार को रच रहा है वो ख़तरनाक है। रिपोर्टिंग नहीं होती है बल्कि मतदाता को गढ़ा जाता है। पहले वो दर्शक को उपभोक्ता बनाता है फिर उपभोक्ता की तरह तरह की पैकेजिंग करता है। इसका विकल्प है और उपाय भी मगर बड़े पैमाने पर करने की न तो मेरी क्षमता है और न संसाधन। तब भी रोज़ रोज़ नया प्रयोग तो कर देता हूँ लेकिन अकेले मेरे बस की बात नहीं है। मुझे अपवाद नहीं बनना है। अपवाद का अकेलापन काटता है। आसान रास्ता है कि बने बनाए फार्मेट में एंकरिंग कीजिये। घर से सूट पहनकर जाइये और बोल कर चले आइये। सुबह छह बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक नया करने का जुनून पागल कर रहा है। पिछले दस दिनों में कितना नया फार्मेट ट्राई किया मगर किसी के लिए नज़ीर नहीं बना। टीवी मर गया है। राजनीतिक दल इसकी लाश अपने कंधे पर ढो रहे हैं क्योंकि उनके काम आ रहा है। सिर्फ उन्हीं के काम का रह गया है।

मैं नहीं मानता कि मतदाता कोई मंगल ग्रह का प्राणी है लेकिन मैं मानता हूँ कि उसे समझने के मेरे सारे उपकरण पुराने हो चुके हैं। कुछ ऊब के कारण तो कुछ वाजिब कारणों से भी। आप चुनावी दौर के स्टुडियो से किए गए प्राइम टाइम भी देखिये। जितना हो सका अपनी ऊब से उबरने के लिए नए तरीके की खोज करता रहा। कामयाब रहा या नहीं मेरे सामने ये सवाल नहीं है, मेरा एक ही सवाल है कि मैं क्यों एक बात को हर पाँच महीने के बाद एक ही तरह से जानूँ। कुछ तो नया होना चाहिए। नए सवाल होने चाहिए।

मूल रूप से बीस साल से उत्तर भारत के दो तीन प्रदेशों में घूमते घूमते मेरा मन उचट गया है। वही राज्य, वही ज़िले, वही गाँव और वही किस्से। बिहार चुनाव से लौटा था तभी तय कर लिया कि अब और बिहार नहीं जानूँगा। सबसे पहले बिहार की किसी ख़बर को पढ़ना और उनसे ख़ुद को जोड़ना बंद कर दिया। एक ही जीवन है। कितना एक ही राज्य को जानूंगा और बार बार वही बातें क्यों जानूँगा। उसी तरह से अब मुझे दिल्ली दिखाई से भी ज़्यादा दिखाई देने लगी है। यूँ समझिये कि एक ही किताब को कितनी बार पढ़ेंगे, तब भी जब हर बार पढ़ने से नए-नए मतलब निकलते हों। मैंने अपना जीवन एक ही राज्य, एक ही भाषा और एक सी बातों को जानने के लिए समर्पित नहीं किया है। मेरी दिली ख़्वाहिश है कि रातों रात भाषा, पेशा, प्रदेश और संस्कृति बदल लूँ। इसी जीवन में कहीं और के जीवन में समा जाऊँ। मलयाली हो जाऊँ, मराठी हो जाऊँ, गुजराती हो जाऊँ। मेरा घर उड़ीसा के किसी शहर में हो जाए या बागडोगरा एयरपोर्ट के पास। अमरोहा से गुज़रते हुए लगता है कि यहीं मेरा घर होगा, करनाल क्रास करते ही लगता है कि इसी के किसी मोहल्ले में रह जाता तो अच्छा लगता। कभी लगता है कि ये वाली मिठाई की दुकान मेरी होती और मैं बेच रहा होता या ये वाली कंपनी मेरी होती और मैं चला रहा होता।

कविताई किस्म के यह ख़्वाब फेसबुक स्टेटस के लिए नहीं हैं बल्कि भीतर समा गए उत्तर भारत से मुक्त होने की बेचैनी के हैं। मेरा पूरा अनुभव संसार उत्तर भारत से बना है। इसमें दम घुटता है।लगता है मैं उत्तर भारत में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहा हूँ ।इसलिए प्रयास करके महाराष्ट्र और चेन्नई के लोगों से दोस्ती की। उनसे बात करता हूँ। पहले भी अपने ब्लाग कस्बा पर लिखा है कि मुझे इस उत्तर भारत से मुक्ति चाहिए। उससे ज़्यादा टीवी में कुछ नया करने की बेचैनी को रास्ता चाहिए।

(नोट- यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के ब्लॉग क़स्बा पर 12 मार्च प्रकाशित हो चुका है)




About the Author

Administrator

Comments


No comments yet! Be the first:

Your Response



Most Viewed - All Categories


Daily Khabarnama Daily Khabarnama