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बरेली: मैं वो शहर हूँ जहाँ मस्जिद में अज़ान होते वक़्त मंदिर में भजन को कुछ देर के लिए रोक दिया जाता ह

सुनिए जरा, मैं वो शहर हूँ जँहा किसी का झुमका गिरा था, मैं आँखों के सुरमे के लिए भी प्रसिद्ध हूँ, मैं अपने आप में एकता की एक मिसाल हूँ, मैं एक ऐसा शहर हूँ जिसके चारो कोनो पे धार्मिक स्थल बने हुए है, तुम अगर पश्चिम को मुंह घुमाओगे तो कंही मन्दिर की ऊँची चोटी दिखाई देगी तो फिर ठीक पीछे मुड़ोगे तो तुम्हे नीले आसमान को छूती हुई मस्जिद की मिनारे दिखाई देंगी, तो ठीक उत्तर में तुम्हे एक लाल कलर का चर्च दिखाई देगा तो उत्तर की ठीक विपरीत एक गुरुद्वारे का सफेद गुम्बद भी दिखाई देगा। 

हाँ मैं वो शहर हूँ जँहा एक ओर मन्दिर में भजन होता है तो ठीक दूसरी तरफ अज़ान होते वक़्त भजन को कुछ देर के लिए रोक दिया जाता है, हाँ मैं उस शहर से हूँ जँहा एक तरफ होली में बनी गुजिये रहमान के घर भेजी जाती है तो दूसरी तरफ ईद की बनी सेवई राम खुद घर आकर खाता है.. हाँ मैं वो हूँ जँहा आला हज़रत साहब भी बसते हैं और साई बाबा भी……….
मानता हूँ की कुछ साल पहले मेरे शहर में दंगा हुआ था जिसकी कहानी और खामियाज़ा यहाँ के लोगो को अभी तक याद है, किसी के घर जले थे, किसी का दिल जला था, रह रह के वो याद आज भी मेरे शहर को अंदर से डराती हैं, उस ख़ौफ़नाक मन्ज़र को याद करके आज भी मेरे शहर के अंदर एक दर्द की लहर सी दौड़ जाती है परंतु फिर भी हम आज बागों में खिलते फुल की खुशबू की तरह हर किसी को अपनी मोहब्बत से सराबोर करते हैं, हर किसी के दिल में सुबह की पहली किरन की तरह चमकते हैं, पेड़ों पर चहकते पंछी की तरह तुतु मेमे भी कर लेते पर संध्या होते ही सब भुल एक हो जाते हैं। और उस पुरे शहर के अंदर से आवाज़ आती है की ये मेरे अपने लोग हैं, यंहा की मन्दिर की ऊँची चोटी और मस्जिद की आसमान छूती मीनारें मेरी शान है इनसे ही मेरी पहचान है, हम कल भी एक थे और आज भी।

लेकिन कुछ दिनों से मैं बहुत परेशान हूँ, मेरे छोटे से हिस्से में कंही कोई वहशी दरिंदा फिर मुझे उन पुरानी यादों में ले जाना चाहता है, जिन ज़ख्मों का अब तक रह रह के दर्द उठता है, फिर वो ले झोंकना चाहन्ता है मुझे उस आग में जिस आग में अब भी कंही चिंगारी देखते ही आग भड़कने की लालसा है, फिर मुझे उस काले इतिहास में ले जाना चहाँते हैं जिस इतिहास के पन्नों पे सिर्फ खून लगा है, फिर उन यादों में लें जाना चहाँता है जँहा सिर्फ नफरत के सिवा कुछ नहीं था………

हाँ कंही मेरे किसी हिस्से में कुच्छ नफरत के नुमाइंदों ने फिर एक धर्म विशेष के लोगो को 30-12-2017 तक गाँव छोड़ने की धमकी दी है, उन्हे मुझसे अलग करने की कोशिश की है, मेरी गोद सुनी करने का इंतेज़ाम किया है, क्या कोई धर्म सत्ता द्वारा आवासीय परमाण पत्र लेने की मोहताज है इस देश में ? क्या उस धर्म विशेष को सत्ता बदलते ही इतना गिरा हुआ समझा जा रहा है कि उन्हे मुझसे जुदा किया जा रहा है ? क्या सत्ता बदलते ही उनको मेरे साए मे रहने का हक़ खत्म हो गया, क्या सत्ता बदलते ही वो पराये हो गए ?

 

क्या मिलेगा उन सब को ये करके ? क्या लगता है उन्हे की वो मेरे बाशिंदों को भगा कर सुकून से रह पाएंगे, अगर वो ऐसा सोचते है तो वो एक बेहद गिरी हुई सोच वाले नाली के कीड़े से भी बद्तर जिंदगी जीने वाले इन्सान हैं……….. जबकी उन्हे पता है की उनकी एक गलती की वजह से मैं पहले भी जख्म खा चूका हूँ, जो अब तक रह रह के सुर्ख हो जाते हैं, और वो अब फिर मुझे घायल करने के फिराख में हैं,

ऐ भारतिय प्रशाशन , ऐ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ, ऐ मेरे हरदिल अजीज और भारत के अमनपसंद लोगों कुछ बोलो, और बचा लो मुझे, हाँ मैं इस भारत की गंगा-जमुना तहजीब को अबतक जीवित रखने वाला शहर बरेली हूँ, हाँ हाँ मैं बरेली हूँ । मैं नहीं चाहता की मेरी गंगा-जमुनी तहज़ीब को एक बार फिर किसी की नज़र लगे………

  • जिलानी अंसारी 



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