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मीडिया उर्दू में लिखे फ़तवे को तो पढ़ सकती है लेकिन बरेली में लगे हिंदी पोस्टर्स को नहीं!

मौजूदा समय में मीडिया का काम सूचना या जानकारी देना नहीं बल्कि प्रोपेगंडा और झूठ का प्रचार करना भर रहा गया है। मीडिया के बारे में ऐसी धारणा आम लोगों के बीच आम होती चली जा रही है। 

हालाँकि देखा जाए तो लोगों के ज़हन में मीडिया की ये तस्वीर बिना वजह नहीं बन रही। इसकी बाकायदा माकूल वजह भी है।

मसलन कल की आई दो ख़बरों को सामने रखकर अगर मीडिया की विश्वसनीयता को सवालों की कसौटी कर कसा जाए तो पत्रकारों के एजेंडे और पत्रकारिता के पतन को आसानी से समझा जा सकता है।

पहली ख़बर है इंडियन आइडल जूनियर की फर्स्ट रनर अप रहीं नाहिद आफरीन के खिलाफ जारी फतवे को लेकर, जो कल दिन भर मेन स्ट्रीम मीडिया से लेकर छोटे-बड़े पोर्टल्स पर छाई रही। टी.वी एंकर्स ने तो इस पर आधे-आधे घंटे का पैकेज बनाकर खूब हो-हल्ला मचाया लेकिन पत्रकारिता के बुनियादी तकाजों को भूल गए। अफवाहों के बाज़ार में उन्होंने ख़बर को क्रॉस चेक करना ज़रूरी नहीं समझा। 

आखिरकार ख़बर गलत निकली और जिस उर्दू में लिखे को मीडिया फतवा बताकर दर्शकों के सामने पेश कर रही थी वो दरअसल मौलानाओं के नाम निकले।

वहीँ यूपी में कल एक और बड़ी घटना सामने आई। जिसे कम से कम फतवे वाली ख़बर से ज्यादा महत्वपूर्ण और संवेदशील तो मान ही सकते हैं। चाहे वो न्यूज़ वैल्यू के लिहाज़ से हो या फिर पत्रकारिता के बुनियादी मकसद के लिहाज़ से।

बहरहाल, ख़बर कुछ यूँ थी कि बरेली से करीब 70 किलोमीटर दूर जिअनागला गाँव में पोस्टर चिपकाकर तुरंत मुसलामानों से गाँव छोड़ने को कहा गया है। गाँव भर में ऐसे दर्जनों पोस्टर्स लगे मिले। बड़ी बात ये कि इस पोस्टर पर भाजपा के एक फायर ब्रांड सांसद का नाम भी लिखा हुआ था। ये हरकत किसकी है, फिलहाल इस बारे में पुलिस अभी तक कुछ पता नहीं लगा पाई है।

लेकिन हमारी मेन स्ट्रीम मीडिया ने इसे दिखाना ज़रूरी नहीं समझा। फतवे को लेकर मौलानाओं के खिलाफ जंग छेड़ने वाले टी.वी एंकर्स ने इसे नज़रंदाज़ कर दिया।

लेकिन अब सोशल मीडिया के दौर में मीडिया की इस चालबाजी पर लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है। 

शातिराना तरीके से किसी ख़बर को लेकर सेलेक्टिव होती मीडिया के रुख का अहसास लोगों को होने लगा है, जिसका आज खूब विरोध भी हो रहा है।

क्या कह रहें हैं लोग  

 

 

  

 

 

  • नवेद अख्तर



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