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कांग्रेस अपने बुने साम्प्रदायिक जाल में फंस गई

आज वास्तविकता यही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपना एक राजनीतिक वजूद है। आज हिंदी भाषी राज्यों में काँग्रेस नदारद है। आज काँग्रेस जीवित भी है तो गैर-हिंदी भाषी राज्यों में है। अभी हाल ही में पाँच राज्यों उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में चुनाव हुए। उत्तरप्रदेश में भाजपा, उत्तराखण्ड में भाजपा, पंजाब में काँग्रेस, गोवा में काँग्रेस और मणिपुर में काँग्रेस की बढ़त रही। चुनाव परिणाम पर गौर से ध्यान दीजिये. भाजपा उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड में बढ़त बनाती है जहाँ हिन्दू समाज बहुसंख्यक है। काँग्रेस की बढ़त बनती है पंजाब में जहाँ सिक्ख की आबादी 57.69%, गोवा में अल्पसंख्यक लगभग 35% (ईसाई 26.5% और मुसलमान 8.3%) और मणिपुर में ईसाई की 41.0 3% आबादी है। इस परिणाम से यह स्पष्ट हो जाता है की जो राज्य अल्पसंख्यक प्रभाव में है वहाँ पर काँग्रेस  की लोकप्रियता अभी भी है और जिन राज्यों में बहुसंख्यकों का अधिक प्रभाव है वहां पर भाजपा लोकप्रिय है। यह एक चिंतनीय विषय है। आख़िर काँग्रेस बहुसंख्यक बहुल राज्यों से क्यों गायब हो गयी? इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने के लिए इतिहास में जाना पड़ेगा। 

भारत का विभाजन इतिहास का एक काला अध्याय है। विभाजन के पीछे अनेकों सकारात्मक और नकारात्मक तथ्य छुपा हुआ है। लेकिन इन सबके पीछे एक सच्चाई यह थी कि विभाजन के पक्ष में खड़े मुसलमानों से तिगुना मुसलमान विभाजन के विरोध में थे। मौलाना आज़ाद और मौलाना हशरत मोहानी जैसे दर्जनों नेता विभाजन विरोधी मुसलमानों का नेतृत्व कर रहे थे। यह वह लोग थे जिन्होंने पाकिस्तान रुपी एक विकल्प होने के बावजूद भारत में अपनी आस्था दिखा रहे थे। लेकिन इन बड़े कांग्रेसी नेताओं के भारत में आस्था रखने के बावजूद उस समय कांग्रेस मुस्लमानों के प्रति कितनी ईमानदार थी?

स्वतंत्रा के पूर्व अंग्रेजों द्वारा भारत में आई०सी०एस० की परीक्षा होती थी। आज के आई०ए०एस० ऑफिसर उस समय आई०सी०एस० अफसर कहलाते थे। उसी आईसीएस अफसर में से एक क़ुद्रतुल्लाह शहाब थे। क़ुद्रतुल्लाह शहाब की एक आईसीएस अफसर के रूप में पहली पोस्टिंग भागलपुर में हुई थी। भागलपुर के बाद औरंगाबाद और फिर सासाराम में कार्यरत रहे थे। बंगाल की भूखमरी के समय कोलकाता में तैनात थे। कोलकाता के बाद क़ुद्रतुल्लाह शहाब उडीसा चले गये और वहीँ डिप्टी गृह सचिव के पद पर कार्यरत थे। उस समय देश में अंतरिम सरकार का गठन हो चुका था और उडीसा के मुख्यमंत्री श्री हरी कृष्ण जी को बनाया गया था।

हरी कृष्ण जी की सरकार में क़ुद्रतुल्लाह शहाब डिप्टी गृह सचिव थे। कुद्रतुल्लाह शहाब लिखते हैं कि जब वह उडीसा के डिप्टी गृह सचिव थे उस समय मुख्यमंत्री के दस्तावेजों को छाँटकर अलग करने की जिम्मेदारी उनकी ही थी। एक बार जब वह दस्तावेजों को अलग कर रहे थे तब उनकी नज़र छः-सात पेज के एक दस्तावेज़ पर पड़ी। वह दस्तावेज़ एक ख़ुफ़िया दस्तावेज़ था जो सभी राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को इस निर्देष के साथ भेजा गया था कि इस राज का खुलासा न हो पाये। उस दस्तावेज़ में लिखा था “भारत का बंटवारा लगभग तय हो चुका हैं। इसलिए जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है उन राज्यों में सभी महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत मुसलमान अधिकारियों को बदल दिया जाये। विशेषरूप से गृह, वित्त और सुचना विभाग में हिन्दू अफसरों को तैनात किया जाये। डीसी, आईजी और एसपी खासतौर से हिन्दू हो। थानों के इंचार्ज भी अधिक-अधिक हिन्दू हो। जिला प्रशासन और पुलिस विभाग से मुस्लिम अधिकारियों को फील्डवर्क से हटाकर ग़ैर-जरुरी दफ़्तरी कामों में लगा दिया जाये। हथियारबंद मुस्लिम सिपाहियों को हथियारविहिन करके पुलिस लाइन और थानों के सामान्य कामों में नियुक्त किया जाये। सीमावर्ती मुसलमानों से युक्त सैन्य-पुलिस की बहाली तोड़ दी जाये, अधिकारियों को वेतन की अग्रिम राशि एकमुश्त देकर नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया जाये। सरकारी खजानों, असलहा के खजानों और स्टॉक-रूम की रक्षा के लिए हिन्दू गार्डो को तैनात किया जाये। हथियार रखने वाले मुसलमान लाइसेंसधारियों की हरकत पर नज़र रखी जाये। ऐसे आपातकालीन नीतियाँ तैयार रखी जाये जिसके आधार पर इन हथियारों को नज़दीकी पुलिस थानों में जब्त रखी जाये। कारों, बसों और ट्रकों के मालिकों की सूचि बनाकर उनपर कड़ी नज़र रखी जाये। इत्यादि, इत्यादि ….”. वह लिखते है कि पत्र में मुख्यमंत्रीयों को स्पष्ट रूप से आगाह कर दिया गया था कि समुदाय विशेष को इस भेदभाव की भनक तक न लगे।

   

यह एक विचारणीय पहलू है कि यह पत्र एक ऐसी पार्टी द्वारा लिखा जा रहा था जो स्वयं को सेकूलर और हिन्दू-मुस्लिम एकता के धोतक समझती थी। जिस पार्टी का एकमात्र उद्देश्य भारत की स्वतंत्रा था। जिस पार्टी के सिद्धांत में बंटवारा नाम की कोई बात नहीं थी और अखंडता उसका मूल सिद्धांत था। इस पत्र को स्वतन्त्रा से लेकर वर्तमान के राजनीतिक घटनाक्रमों के सन्दर्भ में देखने पर स्पष्ट होता है कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। लेकिन मुस्लिम द्वेष में लिखा गया यह पत्र स्वतंत्र भारत में मीठे जहर का काम किया। भारत में राज्य-व्यवस्था दवारा फैलाया गया यह प्रथम शॉफ्ट साम्प्रदायिकता था। आज जब भारत के सत्तर वर्षों के इतिहास को खंगाला जाये तो स्पष्ट हो जाता है कि शासन-व्यवस्था में मुसलमानों की भागीदारी उसी पत्र के अनुसार तय होती है और यही साम्प्रदायिकता को बल देने वाली पहली सीढ़ी है। तब से आजतक काँग्रेस ने साम्प्रदायिक्ता को हमेशा मौन समर्थन दिया है। सच्चर कमिटी रिपोर्ट भी मुसलमानों की उसी प्रशासनिक भागीदारी को नापने का एक टूल मात्र था।

स्वतंत्रता के बाद हजारों ऐसे साम्प्रदायिक दंगे थे जो काँग्रेस के शासन में हुए। उन दंगों के दोषियों पर आजतक न कोई जाँच बैठी और जाँच बैठी भी तो दोषियों पर कोई कानूनी कारवाई सम्भव नहीं हो सका। इसका परिणाम हुआ कि कानपूर, अलीगढ़, हाशिमपुरा, मलियाना, भागलपुर, सीतामढ़ी, मथुरा जैसे एक के बाद अनेकों साम्प्रदायिक दंगा हुआ और साम्प्रदायिक शक्तियों को हौसला बढ़ता गया। इन दंगों के पीछे दो प्रमुख कारण होता था। एक मुसलमानों की आवाज़ को सिमित करना और दूसरा मुसलमानों का भय दिखाकर दलितों और ओबीसी जातियों में उठने वाली ब्राह्मणवाद विरोधी आवाज़ को दबाकर हिन्दू-स्वाभिमान से जोड़ना। सबसे रोचक बात यह है कि दलित और मुसलमान दोनों कांग्रेस के पारम्परिक वोट-बैंक थें। मगर दलित का एक बड़ा तबक़ा मुस्लिम विरोध में काँग्रेस पर तुष्टीकरण का आरोप लगाकर हिन्दू-स्वाभीमान के नाम पर भाजपा के पाले में जा चुका है।

प्राथमिक स्तर के NCERT के पाठ्य-पुस्तकों में इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करके बच्चों की साम्प्रदायिक मानसिकता विकसित की जाती रही है जिसके ऊपर अनेकों बार विशेषज्ञों ने इशारा भी किया। प्राथमिक विद्यालयों में आरएसएस की शाखाएं लगती रही और बच्चों के दिमाग में जहर घोला जाता रहा। मगर कांग्रेस सरकार की नज़र कभी भी इस तरफ नहीं जाकर मदरसा और मस्जिद की तरफ जाती थी। प्रमुख रूप से इसका दो दुष्परिणाम निकला। एक, आरएसएस अपनी सम्प्रदायिक विचारधारा फ़ैलाने में सफ़ल रहा और दूसरा मुसलमानों के मदरसों और मस्जिदों के प्रति एक नफरत का विकास हुआ। आज मदरसा और मस्जिद का भय दिखाकर भाजपा सत्ता के दहलीज पर पहुँच चुकी है।

 

कांग्रेस काल में फ़र्ज़ी आतंकवाद के नाम पर अनगिनत मुस्लिम नवयुवकों की गिरफ्तारी हुई, दर्जनों का एनकाउंटर हुआ और अनेकों की हत्या जेल के भीतर कर दी गयी। मुसलमान युवाओं का एक बेरंग चित्रण किया गया। प्रत्येक मुस्लिम नवयुवक सन्देह की नज़र में देखा जाने लगा। काँग्रेस सरकार ने बेबुनियाद इल्ज़ामों के सहारे जेल में बन्द किया। दशकों बाद जब उन्हें बाइज्जत रिहा किया गया जबतक पूरी एक नस्ल पर आतंकवाद का ठप्पा लग चुका था. राष्ट्र विरोध के नाम पर असंख्य मुसलमानों पर आईएसआई के एजेंट होने का झूठा ठप्पा लगा। आज जब सचमुच में आईएसआई से जुड़े आरएसएस के सदस्य पकड़े गये है तब कांग्रेस भी खामोश होकर मौन समर्थन ही नहीं किया बल्कि मामला को दबाने और बैलेंस बनाने के लिए दिग्विजय सिंह ने उल्टा मदरसों के ऊपर बयान दे डाला। आज भाजपा बहुसंख्यक समाज को आइएसआई और आतंकवाद का भय दिखाकर वोट लेती है।

बांग्लादेशी घुसपैठियों का एक टैग मुसलमानों से जोड़ दिया गया। इंदिरा गाँधी पहली प्रधानमंत्री थी जिन्होंने असम में वामपंथियों की डर से असम में अपनी सरकार बचाने के लिए बंग्लादेशी घुसपैठियों का शिगूफ़ा छोड़ी था। आज यह बंग्लादेशी घुसपैठ राजनीतिक मुद्दा से साम्प्रदायिक मुद्दा में परिवर्तित हो चुका है और मुसलमान सन्देह की नज़र से देखा जाने लगा है। आज भाजपा के प्रमुख चुनाव मुद्दों में से एक बंग्लादेशी घुषपैठ भी मुद्दा है।

 

परिवार नियोजन एक अंतर्राष्ट्रीय मुहीम थी। एक मुस्लिम देश पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय बेनज़ीर भुट्टो भी संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित परिवार नियोजन के समर्थन में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन को सम्बोधि कर चुकी थी। मगर मुस्लिम बहुसंख्यक पाकिस्तान में भी इतना बावेला नहीं मचा। काँग्रेस के संजय गाँधी ने परिवार नियोजन के नाम पर जो बावेला मचाया उसकी गूँज आजतक सुनाई पड़ती हैं। इस बावेला का ही परिणाम है कि आज मुसलमानों की बढ़ती जनसँख्या पर बहस छिड़ी रहती है। बहुसंख्यक समुदाय इस भय में लिप्त है कि बंग्लादेशी घुसपैठ और मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या भारत को इस्लामिक-राष्ट्र बनाने में मदद कर रहा है। भाजपा के लिए यह मुद्दा राम-बाण है।

  

 

जब सन 2002 में गुज़रात का दंगा हुआ उसके बाद लोकसभा चुनाव में देश की जनता ने भाजपा को सत्ता से बाहर करके साम्प्रदायिकता के विरुद्ध अपना विरोध दर्ज किया था। उस समय कांग्रेस के पास एक सुनहरा मौक़ा था कि नरेंद्र मोदी के ऊपर सख़्ती से करवाई कर सकती थी। लेकिन, काँग्रेस इस ग़लतफ़हमी में जीती रही कि जिस प्रकार गुज़रात दंगा के बाद दंगा पर राजनीति करके 2004 में केंद्र की सत्ता मे वापस लौटी थी ठीक उसी प्रकार भाजपा की साम्प्रदायिक चरित्र पर राजनीति करके सत्ता में बनी रहेगी। इसलिए ही कांग्रेस खुद अपने सांसद एहसान ज़ाफ़री को इन्साफ न दिला सकी और सांसद की विधवा ज़किया ज़ाफ़री को दर-दर की ठोकरें खाती रहीं। लेकिन, कांग्रेस के वातानुकूलित दफ़्तर में बैठकर रणनीति तैयार करने वाले नेताओं की दिमाग में यह बात बिलकुल न बैठी की युवाओं का एक बड़ा तबका जो 2002 में स्कूल-गोइंग था युवाओं का वह तबका 2014 में देश की भविष्य को तय करेगा। काँग्रेस के रणनीतिकारों के दिमाग में यह बिल्कुल न समझा कि युवाओं के इस जनसमूह के सामने हर-हर महादेव की जगह हर-हर मोदी का नारा बुलंद करके मोदी विरोध को हिन्दू-स्वाभिमान से जोड़ दिया जायेगा। उन रणनीतिकारों को इतनी भी समझ नहीं थी कि काँग्रेस द्वारा तैयार किया गया मनगढ़ंत फ़र्ज़ी आतंकवाद, आईएसी एजेंट, बांग्लादेशी घुसपैठिया, जनसंख्या वृद्धि, पाठ्यपुस्तक का साम्प्रदायिकरण, मदरसा-मस्जिद का भय, फ़र्ज़ी मुस्लिम तुस्टीकरण इत्यादि को नरेंद्र मोदी मुद्दा बनाकर हिन्दू-स्वाभिमान से जोड़कर कांग्रेस को काँग्रेस द्वारा खोदे गये क़ब्र में ही दफना देगी।

 काँग्रेस हमेशा शॉफ्ट-साम्प्रदायिकता को सहारा बनाकर राजनीति करती रही है। अर्थात शॉफ्ट-हिंदुत्व के नाम पर साम्प्रदायिकता की एक भट्टी तैयार किया। पुरे सत्तर वर्ष में बहुसंख्यक समुदाय में मुस्लिम विरोध का एक माहौल तैयार हुआ। जब एक नयी मानसिकता विकसित होती है तो उस मानसिकता के लोगों में हमेशा उग्रता की तरफ़ बढ़ने की होड़ होती है। राजनीतिक होड़ में उग्र भाजपा ने काँग्रेस द्वारा तैयार उसी भट्टी को तपाकर साम्प्रदायिकता पर विकास की चादर डालकर कांग्रेस को दफन करने का इंतेजाम कर दिया। काँग्रेस अपने अतीत में जाकर जरूर झाँके।

  • तारिक अनवर चम्पारनी



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