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कैम्पसों को संघी हिंसा तथा बाजारवादी लूट से बचाने के लिए हम आवाज़ उठाते रहेंगे: कन्हैया कुमार

आज जेल से बाहर निकलने के एक साल बाद चारों ओर नज़र दौड़ाता हूँ तो देश को एक खुली जेल में बदलने की कोशिश करने वालों की साज़िशों का पूरी मज़बूती के साथ सामना करने वाले लोग दिख रहे हैं। यदि देश के आदिवासी इलाकों में जल, जंगल, जमीन की लूट है तो सोनी सोरी, बेला भाटिया जैसी एक्टिविस्टों का जज़्बा भी है। कैंपसों में एबीवीपी की हिंसा है तो साथियों का संघर्ष भी है। नियम-कानून के नाम पर लड़कियों के पाँव में बेड़ियाँ डालने की साज़िशें हैं तो बीएचयू, डीयू आदि में अपने अधिकारों के लिए उनकी बुलंद आवाज़ भी सुनाई देती है। 

कैंपसों पर जो हमले हो रहे हैं उसकी एक वजह यह है कि जब हम मज़दूरों, आदिवासियों, किसानों आदि के शोषण को फ़ेलोशिप, फ़ीस जैसे मसलों से जोड़ते हुए सरकार की साज़िश की एक बड़ी तस्वीर सामने रखते हैं तो सरकार घबरा जाती है। यही वजह है कि सवाल उठाने की संस्कृति ख़त्म करने के लिए सरकार ने उच्च शिक्षा में सीटबंदी की साज़िश रची है। बड़ी कंपनियों की शिक्षा की दुकानों का मुनाफ़ा बढ़ाना इसका एक और मकसद है।

यही कारण है कि असली सवालों से ध्यान भटकाने के लिए आज कैंपसों में ‘राष्ट्रवाद’ बनाम ‘राष्ट्रद्रोह’ का फर्जी बहस खड़ा किया जा रहा है और देश को लूटने वालों के द्वारा अपने विरोधियों को राष्ट्रद्रोही साबित करने की कोशिश की जा रही है लेकिन अपनी हर कोशिश में नाकाम यह सरकार व इनके गुंडे लोगों की एकता से घबरा रहे हैं और जो सरकार जितना ज़्यादा घबराती है वह उतनी ज़्यादा क्रूरता दिखाती है। और ऐसी सरकार व इनके भक्त ही 20 साल की गुरमेहर कौर की आवाज़ दबाने की कोशिश करती है।

जब बस्तर में कोई पुलिस अधिकारी मानवाधिकार एक्टिविस्टों को ट्रक से कुचलने की बात कह रहा हो, केरल के मुख्यमंत्री को खुलेआम गला काटने की धमकी दी जा रही हो तो ऐसे में कैंपसों की बुलंद आवाज़ को दबाने की कोशिश का कारण समझना मुश्किल नहीं है।

 वे सवालों से डरते हैं। लेकिन हम सवालों को लेकर सड़कों पर बार-बार उतरते रहेंगे। कल बोलने की आज़ादी के पक्ष में और कैम्पसों को संघी हिंसा तथा बाजारवादी लूट से बचाने के लिए मंडी हाउस से दोपहर दो बजे जो रैली निकलेगी आपसब से उसमे शामिल होने की अपील करता हूँ!

(नोट- ये लेख कन्हैया कुमार की फेसबुक वॉल से लिया गया है)




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