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“अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो” लिखने वाला शायर ‘कैफ़ी आज़मी’

कैफ़ी आज़मी (असली नाम : अख्तर हुसैन रिजवी) उर्दू के एक अज़ीम शायर थे। उन्होंने हिन्दी फिल्मों के लिए भी कई प्रसिद्ध गीत व ग़ज़लें भी लिखीं, जिनमें देशभक्ति का अमर गीत -“कर चले हम फिदा, जान-ओ-तन साथियों” भी शामिल है।

जीवन परिचय

कैफ़ी आज़मी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ ज़िले में 14 जनवरी 1919 हुआ था। कैफ़ी आज़मी के परिवार में उनकी पत्नी शौकत आज़मी, इनकी दो संतान शबाना आज़मी (फ़िल्मजगत की मशहूर अभिनेत्री और जावेद अख़्तर की पत्नी) और बाबा आज़मी है।

शिक्षा

कैफ़ी आज़मी के तहसीलदार पिता उन्हें आधुनिक शिक्षा देना चाहते थे। किंतु रिश्तेदारों के दबाव के कारण कैफ़ी आज़मी को इस्लाम धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए लखनऊ के ‘सुलतान-उल-मदरिया’ में भर्ती कराना पड़ा। लेकिन वे अधिक समय तक वहाँ नहीं रह सके। उन्होंने वहाँ यूनियन बनाई और लंबी हड़ताल करा दी। हड़ताल समाप्त होते ही कैफ़ी आज़मी को वहाँ से निकाल दिया गया। बाद में उन्होंनेलखनऊ और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शिक्षा पाई और उर्दू,अरबी और फ़ारसीभाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया।

क़ैफ़ी आज़मी को राष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा कई बार फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला।
1974 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

बीसवी सदी के महानतम शायरों में एक मरहूम कैफ़ी आज़मी अपने आप में यक व्यक्ति न होकर एक संस्था, एक पूरा युग थे जिनकी रचनाओं में हमारा समय और समाज अपनी तमाम खूबसूरती और कुरूपताओं के साथ बोलता नज़र आता है। एक तरफ उन्होंने आम आदमी के दुख-दर्द को शब्दों में जीवंत कर उसे अपने हक के लिए लड़ने का हौसला दिया तो दूसरी तरफ सौंदर्य और प्रेम की नाज़ुक संवेदनाओं को इस बारीकी से बुना कि पढ़ने-सुनने वालों के मुंह से बरबस आह निकल जाय। कैफ़ी साहब साहिर लुधियानवी और शकील बदायूनी की तरह उन गिने-चुने शायरों में थे जिन्हें अदब के साथ सिनेमा में भी अपार सफलता और शोहरत मिली। 1951 में फिल्म ‘बुज़दिल’ के लिए उन्होंने पहला गीत लिखा- ‘रोते-रोते गुज़र गई रात’। उसके बाद जो हुआ वह इतिहास है। उनके लिखे सैकड़ों फ़िल्मी गीत आज हमारी अनमोल संगीत धरोहर का हिस्सा हैं।

एक शायर के रूप में बाकी दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले कैफ़ी आज़मी एक बेहतरीन इंसान थे. आज़मगढ़ जिले के मिजवां में जन्मे अतहर हुसैन रिज़वी ही बाद में कैफ़ी आज़मी बने. कैफ़ी बहुत ही संवेदनशील इंसान थे, बचपन से ही..

जो आदमी सारी दुनिया की तकलीफों को ख़त्म कर देने वालों की जमात में जाकर शामिल हुआ, सबके दर्द को गीतों के ज़रिये ताक़त दी और इंसाफ़ की लड़ाई में जिसके गीत अगली कतार में हों, वह अपना दर्द कभी बयान नहीं करता था. कैफ़ी बहुत बड़े शायर थे. अपने भाई की ग़ज़ल को पूरा करने के लिए उन्होंने शायद १२ साल की उम्र में जो ग़ज़ल कही वह अमर हो गयी. बाद में उसी ग़ज़ल को बेग़म अख्तर ने आवाज़ दी और

“इतना तो ज़िंदगी में किसी की ख़लल पड़े,
हंसाने से हो सुकून न रोने से कल पड़े.”

अपने अब्बा के घर में हुए एक मुशायरे में अपने बड़े भाई की सिफारिश से अतहर हुसैन रिज़वी ने यह ग़ज़ल पढ़ी थी. जब इनके भाई ने लोगों को बताया कि ग़ज़ल अतहर मियाँ की ही है, तो लोगों ने सोचा कि छोटे भाई का दिल रखने के लिए बड़े भाई ने अपनी ग़ज़ल छोटे भाई से पढ़वा दी है.

कैफ़ी आजमी इस मामले में बहुत ही खुश्किसम्त रहे कि उन्हें दोस्त हमेशा ही बेहतरीन मिले. मुंबई में इप्टा के दिनों में उनके दोस्तों की फेहरिस्त में जो लोग थे वे बाद में बहुत बड़े और नामी कलाकार के रूप में जाने गए. इप्टा में ही होमी भाभा, किशन चंदर, मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, बलराज साहनी, मोहन सहगल, मुल्क राज आनंद, रोमेश थापर, शैलेन्द्र, प्रेम धवन, इस्मत चुगताई, एके हंगल, हेमंत कुमार, अदी मर्जबान, सलिल चौधरी जैसे कम्युनिस्टों के साथ उन्होंने काम किया. प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन के संस्थापक सज्जाद ज़हीर के ड्राइंग रूम में मुंबई में उनकी शादी हुई थी. उनकी जीवन साथी शौकत कैफ़ी ने उन्हें इस लिए पसंद किया था कि कैफ़ी आज़मी बहुत बड़े शायर थे. १९४६ में भी उनके तेवर इन्क़लाबी थे और अपनी माँ की मर्जी के खिलाफ अपने प्रगतिशील पिता के साथ औरंगाबाद से मुंबई आकर उन्होंने कैफ़ी से शादी कर ली थी. शादी के बाद कैफ़ी ने बड़े पापड़ बेले. अपने गाँव चले गए जहां एक बेटा पैदा हुआ, शबाना आज़मी का बड़ा भाई. एक साल का भी नहीं हो पाया था कि चला गया. बाद में वाया लखनऊ मुंबई पहुंचे. शुरुआत में भी लखनऊ रह चुके थे, दीनी तालीम के लिए गए थे लेकिन इंसाफ़ की लड़ाई शुरू कर दी और निकाल दिए गए थे. जब उनकी बेटी शबाना शौकत आपा के पेट में आयीं तो कम्युनिस्ट पार्टी ने फरमान सुना दिया कि एबार्शन कराओ, कैफ़ी अंडरग्राउंड थे और पार्टी को लगता था कि बच्चे का खर्च कहाँ से आएगा. शौकत कैफ़ी अपनी माँ के पास हैदराबाद चली गयीं. वहीं शबाना आज़मी का जन्म हुआ. उस वक़्त की मुफलिसी के दौर में इस्मत चुगताई और उनेक पति शाहिद लतीफ़ ने एक हज़ार रुपये भिजवाये थे. यह खैरात नहीं थी, फिल्म निर्माण के काम में लगे शाहिद लतीफ़ साहब अपने एक फिल्म में कैफ़ी लिखे दो गीत इस्तेमाल किये थे. लेकिन शौकत आपा अब तक उस बात का ज़िक्र करती रहती हैं.

कैफ़ी आजमी अपने बच्चों से बेपनाह प्यार करते थे. जब कभी ऐसा होता था कि शौकत आपा पृथ्वी थियेटर के अपने काम के सिलसिले में शहर से बाहर चली जाती थीं तो शबाना और बाबा आजमी को लेकर वे मुशायरों में भी जाते थे. मंच पर जहां शायर बैठे होते थे उसी के पीछे दोनों बच्चे बैठे रहते थे. जो लोग कभी बच्चे रहे हैं उन्हें मालूम है कि बाप से इज्ज़त मिलने पर बहुत अच्छा लगता है. जीरो आमदनी वाले कम्युनिस्ट पार्टी के होल टाइमर कैफ़ी आजमी को जब पता लगा कि उनकी बेटी अपने स्‍कूल से खुश नहीं थी और वह किसी दूसरे स्कूल में जाना चाहती थी, जिसकी फीस तीस रुपये माहवार थी, तो कैफ़ी आजमी ने उसे उसी स्कूल में भेज दिया. बाद में अतरिक्त काम करके अपनी बेटी के लिए ३० रुपये महीने का इंतज़ाम किया. एक बार शबाना आजमी की किसी फिल्म को प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह में दिखाया जाना था. जाने के पहले शबाना को पता लगा कि मुंबई के एक इलाके के लोगों की झोपड़ियां उजाड़ी जा रही हैं तो शबाना आज़मी ने कान का कार्यक्रम रद्द कर दिया और झोपड़ियां बचाने के लिए भूख हड़ताल पर बैठ गयीं. भयानक गर्मी और ज़मीन पर बैठ कर हड़ताल करती शबाना आज़मी का बीपी बढ़ गया. बीमार हो गयीं .सारे रिश्तेदार परेशान हो गए. कैफ़ी आजमी शहर से कहीं बाहर गए हुए थे. लोगों ने सोचा कि उनके अब्बा से कहा जाए तो वे शायद इस जिद्दी लड़की को समझा दें. उनके अब्बा, कैफ़ी आजमी बहुत बड़े शायर थे, अपनी बेटी से बेपनाह मुहब्बत करते थे और शबाना के सबसे अच्छे दोस्त थे. लेकिन कैफ़ी आज़मी कम्युनिस्ट भी थे और उनका टेलीग्राम आया. लिखा था, “बेस्ट ऑफ़ लक कॉमरेड.”

शबाना की बुलंदी में उनके अति प्रगतिशील पिता की सोच का बहुत ज्यादा योगदान है. हालांकि शबाना का दावा है कि उन्हें बचपन में राजनीति में कोई रूचि नहीं थी, वे अखबार भी नहीं पढ़ती थीं. लेकिन सच्चाई यह है कि वे राजनीति में रहती थीं. उनका बचपन मुंबई के रेड फ्लैग हाल में बीता था. रेड फ्लैग हाल किसी एक इमारत का नाम नहीं है. वह गरीब आदमी के लिए लड़ी गयी बाएं बाजू की लड़ाई का एक अहम मरकज़ है. आठ कमरों और एक बाथरूम वाले इस मकान में आठ परिवार रहते थे. हर परिवार के पास एक एक कमरा था. और परिवार भी क्या थे. इतिहास की दिशा को तय किया है इन कमरों में रहने वाले परिवारों ने. शौकत कैफ़ी ने अपनी उस दौर की ज़िन्दगी को अपनी किताब में याद किया है. लिखती हैं, ‘रेड फ्लैग हाल एक गुलदस्ते की तरह था जिसमें गुजरात से आये मणिबेन और अम्बू भाई, मराठवाडा से सावंत और शशि, यूपी से कैफ़ी, सुल्ताना आपा, सरदार भाई, उनकी दो बहनें रबाब और सितारा, मध्य प्रदेश से सुधीर जोशी, शोभा भाभी और हैदराबाद से मैं. रेड फ्लैग हाल में सब एक-एक कमरे के घर में रहते थे. सबका बावर्चीखाना बालकनी में होता था. वहां सिर्फ एक बाथरूम था और एक ही लैट्रीन लेकिन मैंने कभी किसी को बाथरूम के लिए झगड़ते नहीं देखा.”

कैफ़ी आजमी ने अपने बच्चों को संघर्ष की तमीज सिखाई. शायाद इसी लिए उनकी बेटी को संघर्ष करने में मज़ा आता है. हो सकता है इसकी बुनियाद वहीं रेड फ्लैग हाल में पड़ गयी हो. रेड फ्लैग हाल के उनके बचपन में जब मजदूर संघर्ष करते थे तो शबाना के माता पिता भी जुलूस में शामिल होते थे. बेटी साथ जाती थी. इसलिए बचपन से ही वे नारे लगा रहे मजदूरों के कन्धों पर बैठी होती थी. चारों तरफ लाल झंडे और उसके बीच में एक अबोध बच्ची. यह बच्ची जब बड़ी हुई तो उसे इन्साफ के खिलाफ खड़े होने की ट्रेनिंग नहीं लेनी पड़ी. क्योंकि वह तो उन्हें घुट्टी में ही पिलाया गया था. शबाना आजमी ने एक बार मुझे बताया था कि लाल झंडे देख कर उनको लगता था कि उन्हें उसी के बीच होना चाहिए था क्योंकि वे तो बचपन से ही वहीं होती थीं. उन्हें दूर-दूर तक फहर रहे लाल झंडों को देख कर लगता था, जैसे शबाना पिकनिक पर आई हों. बीसवीं सदी की कुछ बेहतरीन फ़िल्में कैफ़ी के नाम से पहचानी जाती हैं. हीर रांझा में चेतन आनंद ने सारे संवाद कविता में पेश करना चाहा और कैफ़ी ने उसे लिखा. राजकुमार की यह फिल्म पता नहीं कहाँ तक पहुंचती अगर प्रिया की जगह कोई और हेरोइन होती. हकीकत भी कैफ़ी की फिल्म है और गरम हवा भी. कागज़ के फूल, मंथन, कोहरा, सात हिन्दुस्तानी, बावर्ची, पाकीज़ा, हँसते ज़ख्म, अर्थ, रज़िया सुलतान जैसी फिल्मों को भी कैफ़ी ने अमर कर दिया.

गीतकार के रूप में उनकी प्रमुख फ़िल्में हैं – शमा, गरम हवा, शोला और शबनम, कागज़ के फूल, आख़िरी ख़त, हकीकत, रज़िया सुल्तान, नौनिहाल, सात हिंदुस्तानी, अनुपमा, कोहरा, हिंदुस्तान की क़सम, पाक़ीज़ा, उसकी कहानी, सत्यकाम, हीर रांझा, हंसते ज़ख्म, अनोखी रात, बावर्ची, अर्थ, फिर तेरी कहानी याद आई। इतनी सफलता के बावज़ूद हिंदी फ़िल्मी गीतों के बारे में उनका अनुभव यह था – “फ़िल्मों में गाने लिखना एक अजीब ही चीज थी। आम तौर पर पहले ट्यून बनती थी, फिर उसमें शब्द पिरोए जाते थे। ठीक ऐसे कि पहले आपने क़ब्र खोद ली, फिर उसमें मुर्दे को फिट करने की कोशिश की। कभी मुर्दे का पैर बाहर रहता था, कभी हाथ। मेरे बारे में फ़िल्मकारों को यकीन हो गया कि मैं मुर्दे ठीक गाड़ लेता हूं, इसलिए मुझे काम मिलने लगा।”
उन्होंने फिल्म हीर रांझा, गरम हवा और मंथन के लिए संवाद भी लिखे थे।

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई
फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया
कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया

मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने के रुत रोज़ आती नहीं
हस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे
वह जवानी जो खूँ में नहाती नहीं

आज धरती बनी है दुलहन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

राह कुर्बानियों की न वीरान हो
तुम सजाते ही रहना नए काफ़िले
फतह का जश्न इस जश्न‍ के बाद है
ज़िंदगी मौत से मिल रही है गले

बांध लो अपने सर से कफ़न साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

खींच दो अपने खूँ से ज़मी पर लकीर
इस तरफ आने पाए न रावण कोई
तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे
छू न पाए सीता का दामन कोई
राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो :)

इस विलक्षण शायर और गीतकार के यौमे पैदाईश (14 जनवरी) पर हमारी हार्दिक श्रधांजलि, उनकी एक ग़ज़ल के साथ !

लो पौ फटी वह छुप गई तारों की अंज़ुमन
लो जाम-ए-महर से वह छलकने लगी किरन

खुपने लगा निगाह में फितरत का बाँकपन
जलवे ज़मीं पे बरसे ज़मीं बन गई दुल्हन

गूँजे तराने सुब्ह के इक शोर हो गया
आलम तमाम रस में सराबोर हो गया

फूली शफ़क फ़ज़ा में हिना तिलमिला गई
इक मौज़-ए-रंग काँप के आलम पे छा गई

कुल चाँदनी सिमट के गिलो में समा गई
ज़र्रे बने नुजूम ज़मीं जगमगा गई

छोड़ा सहर ने तीरगी-ए-शब को काट के
उड़ने लगी हवा में किरन ओस चाट के

मचली जबीने-शर्क पे इस तरह मौज-ए-नूर
लहरा के तैरने लगी आलम में बर्क-ए-तूर

उड़ने लगी शमीय छलकने लगा सुरूर
खिलने लगे शिगूके चहकने लगे तयूर

झोंके चले हवा के शजर झूमने लगे
मस्ती में फूल काँटों का मुँह चूमने लगे

थम थम के जूफ़िशाँ हुआ ज़र्रों पे आफ़ताब
छिड़का हवा ने सब्जा-ए-ख्वाबीदा पर गुलाब

मुरझायी पत्तियों में मचलने लगा शबाब
लर्ज़िश हुई गुलों में बरसने लगी शराब

रिन्दाने-मस्त और भी बदमस्त हो गये
थर्रा के होंठ जाम में पेवस्त हो गये

दोशीज़ा एक खुशकदो-खुशरंगो-खूबरू
मालिन की नूरे-दीद गुलिस्ताँ की आबरू

महका रही है फूलों से दामान-ए-आरजू
तिफ़ली लिये है गोद में तूफ़ाने-रंगो-बू

रंगीनियों में खेली, गुलों में पली हुई
नौरस कली में कौसे-कज़ह है ढली हुई

मस्ती में रुख पे बाल-ए-परीशाँ किये हुये
बादल में शमा-ए-तूर फ़रोज़ाँ किये हुये

हर सिम्त नक्शे-पा से चरागाँ किये हुये
आँचल को बारे-गुल से गुलिस्ताँ किये हुये

लहरा रही है बादे-सहर पाँव चूम के
फिरती है तीतरी सी गज़ब झूम झूम के

ज़ुल्फ़ों में ताबे-सुंबुले-पेचाँ लिये हुये
आरिज़ पे शोख रंगे-गुलिस्ताँ लिये हुये

आँखों में बोलते हुये अरमाँ लिये हुये
होठों पे आबे-लाले-बदख्शाँ लिये हुये

फितरत ने तौल तौल के चश्मे-कबूल में
सारा चमन निचोड़ दिया एक फूल में

ऐ हुस्ने-बेनियाज़ खुदी से न काम ले
उड़ कर शमीमे-गुल कहीं आँचल न थाम ले

कलियों का ले पयाम गुलों का सलाम ले
कैफ़ी से हुस्ने-दोस्त का ताज़ा कलाम ले

शाइर का दिल है मुफ़्त में क्यों दर्दमंद हो
इक गुल इधर भी नज़्म अगर यह पसंद हो

<3 कैफ़ी आज़मी <3




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BADRI NATH YADAVAugust 15, 2016 Reply

कामरेड कैफी आजमी को लाल सलाम


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