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भारतीय समाज एवं धर्म-दर्शन में नारी की स्थिति-जो नीचों से नीच है स्त्रियाँ उनसे भी नीच हैं (आरण्य क

भारतीय समाज में नारी की स्थिति अत्यन्त दयनीय है, जहाँ उन्हें तरह-तरह के अंधविश्वास में जकड़ दिया गया है कि वह अपने उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने की सोंच भी नहीं सकती ! वास्तव में हिन्दु समाज में नारी के लिये जीवन तक के लिये कर्तव्य तो हैं परन्तु अधिकार नहीं ! यहाँ नारी का अपना कोई अस्तित्व नहीं है ! नारी को पहले पिता फिर पति और अन्त में पुत्र के अधीन रहना पड़ता है ! फिर भी उन्हें पापी, कुलटा, कामुक, झूटी, गंदी और अवगुणों की खान बता कर उनकी निन्दा की जाती है , आशचर्य तो इस बात पर होता है कि नारी निन्दा वेद, पुराण, श्रुति, स्मृति से लेकर भारत के महान साहित्य, इतिहासों तक में भरे पड़े हैं . निन्दा करने वाले कोई साधारण लोग नहीं बल्कि वेदों,पुराणों, श्रुति एवं स्मृति के रचीयता एवं सूर, कबीर, तुलसी जैसे “महान संत” माने जाने वाले लोगों से लेकर भारत के कई महान कवियों को भी इसमें शामिल किया जा सकता है!
 
यहाँ मैंने विभिन्न धर्म-ग्रंथों में उद्धरित नारी निन्दकउक्तियों को यथासंभव एकत्रित करने का प्रयास किया है ताकि जो लोग इस्लाम पर कीचड़ उछालते हैं उन पर लगाम लगाया जा सके ! इसे मैंने अपने युवा दोस्तों के लिये एकत्रित किया है, ताकि इसे पढ़कर ख़ुद भी जानकारी प्राप्त कर सकें तथा संघी दुश्प्रचार का मुंहतोड़ जवाब भी दे सकें !
सबसे पहले वेद का अवलोकन करते हैं :
“इंद्रश्चिदा तदब्रबीत स्त्रिया आशास्य मनःउतो अंह क्रंतु रघुम |”(ऋग्वेद-८/३३/१७)
अर्थात् : इन्द्र कहते हैं ‘नारी के मन का दमन नहीं किया जा सकता है, उसकी बुद्धि बहुत ही अल्प होती है !’
“न वे स्तैणाणि रख्याति संति साला वृकाणां ह्रदयान्येता |”(ऋग्वेद१०/९५/१५)
अर्थात् स्त्रियों से मित्रता करना व्यर्थ है, क्योंकि उनका ह्रदय भेड़िये के समान होता है !
स्मृतियों में श्रेष्ट माना जाने वाला मनुस्मृति नारी के संमबंध में क्या कहता है:-
@शय्यासनमलंकारं कामं क्रोधमनाजंवम् |
द्रोहभावं कुचर्या च स्त्रीभ्यों मनुरकल्पयत् ||(९/१७)
अर्थात् मनुजी ने सृष्ट्यादि में शय्या , आसन , आभूषण , काम , क्रोध , कुटिलता , द्रोह और दुराचार की स्त्रियों के लिये ही कल्पना की है !
@नैता रूपं परीक्षन्ते नासां व्यसि संस्थितिः |
अरूपंवा विरूपंवा पुमानित्येव भुञ्जते || (९/१४)
पौंश्चल्याच्चल चित्ताश्च नैस्नेह्याच्च स्वभावतः |
रक्षिता यत्नतोडपीह भंतृष्वेता विकुर्वते |(९/१५)
एवं स्वभावं ज्ञात्वासां प्रजापति निसर्गजम् |(९/१६)
अर्थात् : स्त्रियां रूप की परीक्षा नहीं करती हैं , न तो अवस्था का ध्यान रखती हैं सुन्दर हो या कुरूप हो,पुरूष होने मात्र से वे उसके साथ संभोग करती हैं. पुंश्चल (पराये पुरूष से भोग की इच्छा) दोष से , चंचलता से और स्वभाव से ही स्नेह न होने के कारण घर में यत्न पूर्वक रखने पर भी स्त्रियाँ पति के विरुद्ध काम करती हैं . ब्रह्माजी ने स्वाभाव से ही स्त्रियों का ऐसा स्वभाव बनाया है.
@ नास्ति स्त्रीणां क्रिया मन्त्रैरिति धर्मे व्यवस्थितिः|
निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोडनृतमिति स्थितिः||(९/१८)
अर्थात् : धर्मशास्त्र की व्यवस्था के अनुसार स्त्रियों की जात कर्मादि क्रियाएं मन्त्रों से नहीं करनी चाहिये. उन्हें मन्त्रों का ज्ञान और अधिकार भी नहीं है, उनकी झूठ में ही स्थिति है .
@: भिन्दन्त्यवमता मन्त्रं तैर्यग्योनास्तथैव च |
स्त्रिचश्चैव विशेषेण तस्मात्रत्रादृतो भवेत् ||(७/१५०)
अर्थात् : ये लग अपमानित होने पर गुप्त मन्त्रणा प्रकट कर देते हैं . वैसे ही शुक सारिकादि पक्षी और विशेषकर स्त्रियाँ गुप्त मन्त्र प्रकट कर देती हैं, इसलिये राजा इन सब को मन्त्रणा स्थल से दूर रखे .
@: पिता रक्षति कौमारे भर्तारक्षिति यौवने |
रक्षति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातंत्र्यमंहति ||(९/३)
अर्थात् : स्त्रियों की वाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करता है, स्त्री कभी स्वतंत्रता के योग्य नहीं होती .
@: वाल्ये पितुवंशे तिष्ठेत्पाणिग्राहास्य योवने |
पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेव्स्त्री स्वतन्त्रताम् ||(५/१५८)
अर्थात् : स्त्री वाल्यकाल में पिता, यौवनावस्था में पति के और पति के मरने पर पुत्रों के अधीन होकर रहे. कभी स्वतंत्र हो कर न रहे.
@: अस्वतन्त्राः स्त्रियाः कार्याः पुरूषैः स्वैर्दिवा निशम् |
विषयेषु च सज्जन्त्यः संस्थाप्या अात्मनो वशे ||(९/२)
अर्थात् : पुरूष को अपनी स्त्रियों को कभी स्वतंत्रता न देनी चाहिये. स्त्रियाँ यदि रूपरसादि में आसक्त हो तो भी उन्हें अपने वश में रखे .
@: यस्मै दधात्पिता त्वेनां भ्राता वानुमते पितुः |
ते शुश्रूषेत जीवन्तं संस्थितं च न लड्धयेत् ||(५/१५१)
अर्थात् : पिता या पति की आज्ञा से भाई जिस पुरूष का हाथ धरा दे, जीवित अवस्था में उसकी शुद्ध ह्रदय से सेवा करे और उसके मरने पर धर्म का उल्लंघन (दूसरा विवाह) न करे .
…..नारी का वो धर्म क्या है , जिसका उल्लंघन करने से मनुस्मृति मना करता है , दोखिये :
@: कामं तु क्षपयेद्देहं पुष्प मूल फलैः शुभैः |
नतु नामापि गृहणीयात्पत्योप्रेते परस्य तु ||(५/१५७)
आसीता मरणात्क्षान्ता नियता ब्रह्मचारिणी |
यो धर्म एक पत्नीनां काड़्क्षन्ती तभनुत्तमम् ||(५/१५८)
अर्थात् : पति के मरने पर स्त्री पवित्र फल, फूल, और मूल खा कर देह को क्षीण करे, परन्तु पर पुरूष का कभी नाम न ले. विधवा स्त्री पतिव्रता के उत्तम धर्मों को चाहती हुई मरते दम तक क्षमायुक्त और नियमपूर्वक ब्रह्मचारिणी होकर रहे.
मनुस्मृति में विधवा के लिये जहाँ यह प्रावधान बनाया गया है वहीं स्त्री के मरने के बाद पुरूष के लिये क्या व्यवस्था है उसका वर्णन करना यहाँ अनुचित न होगा:
@: भार्यायै पूर्वमारिण्यै दत्वाग्नीनन्त्य कर्माणि |
पुनर्दार क्रियां कुर्यात्पुनराधानमेव च ||(५/१६८)
अर्थात् : पति के पहले मरने वाली स्त्री को अन्तकर्म में अग्नि दे चुकने के पश्चात् वह पुरूष पुनर्विवाह करके श्रोत या स्मार्त अग्निहोत्र ले .
मनुस्मृति ने जहाँ अनमेल विवाह का प्रावधान बनाया है,
@: त्रिंसद्वर्षोद्वहेत्कन्यां ह्रधां द्वादश वार्षिकीम् |
त्र्यष्टवर्षोडष्ट वर्षा वा धर्मेसीदति सत्वरः ||(९/९४)
अर्थात् : तीस वर्ष उम्र वाला वर बारह वर्ष की सुन्दर कन्या एवं चौबीस वर्ष का वर आठ वर्ष की कन्या के साथ विवाह करे. इससे शीघ्रता करने वाला धर्म (ग्राहेस्थ्य क्लेश पाता है) वहीं नारी के लिये ऐसा प्रावधान है कि चाहे पुरूष जैसा भी हो और कितना भी अत्याचारी हो स्त्री उससे तलाक नहीं ले सकती बल्कि हर हाल में उसकी ‘चरणों’ की दासी ही बनी रहे :
@: विशीलः कामवृत्तो वा गुणैर्वा परिवर्जितः |
उपचर्मः स्त्रिया साध्व्या सततं देववत्पतिः ||(५/१५४)
नास्ति स्त्रिणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम् |
पति शुश्रषते येन तेन स्वर्गे महीयते ||(५/१५५)
अर्थात् : यदि पति अनाचारी हो या पर स्त्री में अनुरक्त हो या विधादि गुणों से रहित हो तब भी साध्वी स्त्री को सर्वदा देवता की भांति अपने पति की सेवा करनी चाहिये . स्त्रियों के लिये न अलग से यज्ञ है, न व्रत है और न उपवास है, पति की सेवा से ही वह स्वर्ग लोक में पूजित होती है.
ठीक इसी प्रकार के विचार वाल्मीकि रामायण में भी है (भले ही वह पुण्यात्मा हो या पापी , कठोर हो या दयालु , धनी हो या निर्धन, इच्छाओं का दास हो या वफादार , स्त्री को उसकी सेवा व पूजा करनी ही चाहिये. “अयोध्या कांड का० स०:११७) लेकिन पुरूषों के लिये सुविधा के लिये कहा गया है :
@: विधिवत्प्रतिगृह्यापि त्यजेत्कान्यां विगर्हिताम् |
व्याधितां विप्रदुष्टां व छद्मना चोपपादिताग् ||(९/७२)
अर्थात् : जो कन्या निन्दित , रोगिणी, कलंकित अथवा छल से अच्छी बताई गई हो ऐसी कन्या विवाह विधि से ग्रहण करके भी त्याग की जा सकती है.
बहुपत्नित्व हिन्दु समाज का अभिन्न अंग रहा है, एक दो नहीं सैंकड़ों में पत्नियाँ होती थीं . राजा दशरथ की तो ३५२ पत्नियाँ थीं. लेकिन औरतों को नाराज़ होने का भी अधिकार नहीं था :-
@: अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रषितां गृहात् |
सासधः संनिरोद्धव्या त्याज्या वा कुल संनिधौ ||(९/८२)
अर्थात् : जो स्त्री स्वामी के दूसरा विवाह करने पर रुष्ट हो कर घर से भागे तो उसे पकड़ कर घर में बन्द कर देना चाहिये या उसको उसके बाप के घर पहुँचा देना चाहिये .
……..अगर कोई स्त्री गलती से भी अपने मायके की सम्पति या अपनी सुन्दरता के कारण अगर पति को कुछ बोल दे तो उसके लिये अतिक्रूर और वीभत्स सज़ा रखी गयी है , देखें :
@: भर्तारं लड़्घयेधातु स्त्री ज्ञाति गुण दर्पिता |
तां श्वमिः खादयेद्राजा संस्थाने बहु संस्थिते ||(८/३७१)
अर्थात् : जो स्त्री अपने बाप दादा के धन और रूपगुणों के उपर घमंड कर पति का निरादर करे , तो राजा को उसे बहुत से लोगों के सामने कुत्तों से नुचवा डालना चाहिये .
आईये अब हम तुलसीकृत रामायण का अवलोकन करते हैं, जो सम्पूर्ण भारत में हिन्दु समाज द्वारा रोज़ाना आदर के साथ पढ़ा जाता है :
@; “स्त्री के ह्रदय की गति को विधाता भी नहीं जान सकता, स्त्री का ह्रदय सम्पूर्ण कपट, पाप, और अवगुणों की खान होता है !”(अयोध्या काण्ड, १६२/२)
@: “जो नीचों से नीच है, स्त्रियाँ उनसे भी नीच हैं !” (आरण्य काण्ड:६२/२)
@: “स्त्री को चाहे ह्रदय से लगाकर रखो , तो भी स्त्री , शास्त्र और राजा किसी के वश में नहीं रहती !”(अरण्य काण्ड , ६५/१,५)
@: “काम , क्रोध , लोभ , मद आदि प्रबल मोह की धाराएं हैं, उनमें भी अत्यंत कठिन दुख देने वाली माया रूपिणी स्त्री है !”(अरण्य काण्ड, ७६)
@: “हे मुनि ! सुनो !! पुराण , वेद और संत कहते हैं कि मोह रूपी वन में नारी वसंत ऋतु है, और वही ग्रीष्म ऋतु हो कर जप , तप, नियम आदि सब जलाशयों को सुखा देती है. वही स्त्री वर्षा रूपिणी होकर काम , क्रोध, मद, मत्सर आदि मेंढकों के लिये सुख देने वाली हो जाती है और दुष्ट वासना रूपी कुमुदिनियों के समूह को सदा सुख देने वाली शरद ऋतु रूपिणी हो जाती है. मंद थोड़ा सुख देने वाली स्त्री हेमंत ऋतु रुपिणी होकर सम्त धर्म रूपी कमलों के समूह को पाला बन कर मार डालती हैं , फिर शिशिर ऋतु होकर वह ममता रूपी जवासे को ख़ूब हरा-भरा कर देती है! स्त्री रूपिणी घोर अंधेरी रात , पाप रूपिणी उल्लुओं के समूह को सुख देने वाली है और बुद्धि , बल , शील ,तथा सत्य , इन सब मच्छलियों के लिये स्त्री वंसी रूपिणी हो जाती है ! ऐसा चतुर लोग कहते हैं !”(अरण्य काण्ड, ७६/१,२,३,४)
@: “इस प्रकार स्त्रियाँ अवगुणों की मूल , पीणा देने वाली और सब दुखों की खान है !”(अरण्य काण्ड, ७७)
@: “ढोल , गवांर , शुद्र , पशु और नारी ये सब ताड़ना (पीटने) के अधिकारी हैं !” (सुन्दर काण्ड, ६२/३)
@: “स्त्रियों के केश ही उनके भूषण हैं , वो भुक्कड़ होती हैं , वे धनहीन , दुखी होती हैं , उनमें समता बहुत होती है ! वे मूर्खा ! धर्मरता तो होती नहीं , किन्तु सुख चाहती हैं !! उनमें बुद्धि कम होती हैे , वह कठोर होती हैं , उनमें कोमलता नहीं होती !”(उत्तर काण्ड, १६१ छंद १)
@: “स्त्री मनोहर पुरूष को देखते ही , वह चाहे भाई हो , पिता हो या पुत्र ही क्यों न हो , विकल हो जाती है और अपने मन को रोक नहीं सकती ! जैसे सूर्य को देखकर सूर्यकान्त मणि पिघल जाती है , वैसे ही सुन्दर पुरूष को देखकर स्त्रियाँ पिघल जाती हैं !”(अरण्य काण्ड, २८/४ क्या इससे भी अधिक कोई अपमान जनक बात हो सकती है ?)
@: “विद्वानों ने स्त्रियों का स्वभाव ठीक ही कहा है , उनका कपट सभी प्रकार अगम और अथाह होता है . कोई अपनी परछाईं को भले ही पकड़ ले , पर भाई ! स्त्री की गति -चाल नहीं जानी जा सकती !”(अयोध्या काण्ड,४७/४)
@: “स्त्री स्वभाव से ही अपवित्र है. पति की सेवा करने से ही उसे सदगति प्राप्त होती है !”(अरण्य काण्ड, ५/९)
…….शतपथ ब्राह्यमण में स्त्रियों के बारे में क्या विचार हैं आईये देखते हैं :
@: “स्त्री , शुद्र , कुत्ता और कौवा में असत्य , पाप एवं अंधकार विधमान होता है .”(१४-१-१-३१)
@: “पत्नियाँ धृत या ब्रज से हत होने पर और बिना पुरूष के होने पर न तो अपने पर अधिकार रखती हें और न तो सम्पत्ति पर !(४-४-२-१३)
@ : “वह इस प्रकार स्त्रियों को आश्रित बनाता है , अतः स्त्रियाँ पुरूष पर यक़ीनन आश्रित रहती हैं !”(१३-२-२४)
अब आईये हम महाभारत के अन्दर नारी के विषय में विचार जानते हैं ;
@: “सुत्रकार का निष्कर्ष है कि स्त्रियां अनृत (झूठी) होती हैं .”(अनुशासन पर्व,१९/६)
@:”स्त्रियों से बढ़कर कोई अन्य दुष्ट नहीं है. ये एक साथ ही छुरी की धार , ज़हर , साँप और अाग हैं.”(अनुशासन पर्व, २८:१२&२९)
@: “सैंकड़ों हज़ारों में कहीं एक स्त्री पतिव्रता मिलेगी .” (अनुशासन पर्व, १९/९३)
@ : “स्त्रियां वास्तव में दुर्दमनीय होती हैं , उनमें राक्षसों , शम्बर , नमुचि और अन्य लोगों की धूर्तता पायी जाती है . पुरूषों को अपनी ओर आकृष्ट करना उनका स्वभाव होता है. अतः वित्त लोग नवयुवतियों से सावधानी के साथ बात करते हैं , क्योंकि वह सभी को चाहे वह वित्त हो या अवित्त गुमराह कर देती हैं.”(अनुशासन पर्व, ३८:१६,४८,३७,३८)
नितिशास्त्र के पंडित कहे जाने वाले चाणक्य का विचार देखें :
@: स्त्रीणां द्विगुण अहारो , लज्जाचापि चतुगुणां |
साहसं षड्गुणं चैव , कामश्चाष्ट गुणः स्मृतः ||
अनृतं साहसं माया , मुर्खत्वमतिलोभिता |
अशोचत्वं निर्दयत्वं , स्त्रीणां दोषः स्वभाजा:||
अर्थ : “स्त्रियों में भूख , लज्जा , काम , साहस , झूठ , छल ,कपट , मुर्खता , लोभ , अपवित्रता एवं निर्दयता आदि स्वाभिक दोष हैं !”
#श्रीमद भागवद में कहा गया है कि :
@: महत्सेवां द्वार भाहुर्विमुक्तेस्तमोद्वारं योषितां संगिसंगम् (५-५-२)
अर्थ : “महापुरूषों की सेवा से मुक्ति मिलती है और नारी की संगत से नर्क मिलता है !”
पुनः लिखा है :
@: “न तथास्य भवेत् क्लेशो वंधइचान्य प्रसंगतः |
योषित्संगाद् तथा पुंसो तथा तत्संगिसंगतः |(११-१४-३०)
अर्थ : “नारी की संगत से नरी और पुरूष की संगत से पुरूष को क्लेशयुक्त होना पड़ता है !”
…….ब्रह्मवैवत पुराण में देवर्षि नारद पितामह ब्रह्मा जी से यूँ कहते हैं :
@: “यत्तेमे दोषनिवहा का आस्थातत्र पितामह का क्रीड़ा कि खसं पुसो विण्मूत्रमलवेश्यानि”
” तेज प्रणष्टं संभोगे दिवालापे यशः क्षयः
धन क्षयो अतिप्रीतौ चत्यासक्तौ वपुक्षयः
साद्वित्ये पौरूषनंएं कलहे माननाशनम्
सर्वनाशस्य विश्वासे ब्रह्मन्नारीषु किं सुखमा’.(२३-३३-३५)
अर्थ : “हे पितामह ! जिस नारी में इतने दोष हैं उसमें कैसी आस्था ? मलमूत्र से भरे शरीर में पुरूषों को कैसा सुख प्राप्त होता है , जो उससे क्रीड़ा करते हैं ? संभोग से तेज नाश होता है , बात करने मात्र से यश का नाश होता है , अधिक प्रेम से धन का नाश होता है और आशक्त होने से तो शरीर का नाश हेता है. कलह से मान नाश और विश्वास करने से सर्वनाश होता है , तो ऐसी सर्वनाशी नारी से क्या सुख ? “
मैत्रायणी संहिता में भी नारी को झूठ का अवतार बताया गया है .(१-१०-११) और तैत्तिरीय संहिता में कहा गया है कि “स्त्रियाँ बेगैर शक्ति की होती हैं , उन्हें सम्पत्ति में हिस्सा नहीं ! वे दुष्ट से भी बढ़कर दुर्बल ढंग से बोलती हैं !” ठीक इसी प्रकार मनुस्मृति (९-१८) और बौधायन धर्मसूत्र(२-२-५३) में भी साफ शब्दं में कहा गया है कि स्त्रियों को सम्पत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिलता और न ही उन्हें वैदिक मंत्रों ही का ज्ञान अधिकार है !
हेमचन्द्र ने नारी को नरक की राह द


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