All Categories


Pages


ईरान और सऊदी अरब “शिया-सुन्नी” के नाम पर मुसलमान को गुमराह कर रहे हैं

सबसे ज्यादा बेवकूफ़ वो लोग होते हैं जिनकी तबाही के लिए दुनिया घात लगाए बैठी हो, और वो लोग हों कि आपस मे अपनों ही की जड़ें काटने मे लगे हों ….
ऐसे लोग जल्द तबाह होते हैं, और अपनी तबाही के ज़िम्मेदार खुद होते हैं … 

ईरान और सऊदी अरब की अपनी ज़ाती लड़ाई की वजह कर पिछले 40 साल में जितना जानी और माली नुक़सान मुसलमानो को हुआ है उतना पिछले 1400 साल में नही हुआ है , मंगोलों का विध्वंसक आक्रमण हो या फिर स्पेन का ज़वाल सबको मिला भी दिया जाये तो उतना नुक़सान नही हुआ जो इन दोनों मुल्को की वजह कर मुसलमानो को उठाना पड़ रहा है

आलमे इस्लाम इस वक़्त अपने सबसे नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है , एक एक करके मुस्लिम रियासत का ज़वाल हो रहा है , चाहे वो अफ़ग़ानिस्तान हो या इराक , सीरिया हो या फिर लीबिया , यमन हो या फिर लेबनॉन , हर जगह मुसलमान आपस में एक दूसरे की जड़ें काटने में लगे हैं , कहीं शिया और सुन्नी के नाम पे तो कहीं ज़बान के नाम पर :)

आइये नज़र डालते हैं शिया सुन्नी के बीच के मसले पर

मुसलमान कहते हैं कि उनके धर्म ‘इस्लाम’में कोई त्रुटि और अन्तर्विरोध नहीं है।
पूरी मुस्लिम जाति ‘एकेश्वरवाद’के आधार पर एक ही वैश्विक समुदाय है। फिर शिआ-सुन्नी विभेद क्यों?
दोनों सम्प्रदायों में विद्वेष व दुर्भावना क्यों?
दोनों में परस्पर हिंसक घटनाएं क्यों घटती हैं?
………………..
मुस्लिम समुदाय अपनी अस्ल में, एक वैश्विक समुदाय (Global, Universal Community) है। इस्लाम की मूल धारणाएं सुन्नी, शिआ दोनों में समान हैं।

ये समानताएं निम्नलिखित हैं–
* मूलधारणाएं : ●एकेश्वरवाद ●परलोकवाद ●ईशदूतवाद
* मूल स्तंभ : शहादह (अल्लाह के एकेश्वरत्व और हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के ईशदूतत्व की गवाही (मौखिक एलान) ●नमाज़ ●रमज़ान के रोज़े ●ज़कात (अनिवार्य धन-दान) ●हज
* अन्य : ●अल्लाह पर ईमान ●अल्लाह के रसूलों पर ईमान ●अन्तिम रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) पर ईमान ●ईश्वरीय धर्म-ग्रंथों-और अन्तिम ग्रंथ कु़रआन पर ईमान ●क़यामत (प्रलय) आने पर ईमान ●तक़दीर (भाग्य) के ईश्वर द्वारा तय किए जाने पर ईमान ●अल्लाह के फ़रिश्तों (देवदूतों) पर ईमान ●अन्तिम ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की हदीसों (कर्म व कथन) के लिखित संग्रहों पर विश्वास तथा उनका अनुपालन।

* उपरोक्त बातें इस्लाम का मूल और आधार हैं। सुन्नी और शिआ समुदायों की ‘मूल-उक्ति’ (कलिमा)–‘ला इलाह इल्ल्-अल्लाह मुहम्मद्-उर-रसूल-अल्लाह’ एक ही है। दोनों, जहां अवसर होता है एक साथ, एक इमाम के पीछे पंक्तिबद्ध होकर, नमाज़ पढ़ते हैं। एक साथ हज करते हैं। एक ही कुरआन का पाठ (तिलावत) करते हैं। परलोक जीवन में स्वर्ग (जन्नत) या नरक (जहन्नम) में एक समान विश्वास रखते हैं। ईश्वर की पूजा-उपासना में किसी को साझी-शरीक (शिर्क) नहीं करते।

* विभेद : दोनों समुदायों में विभेद की अस्ल, ‘धार्मिक’ नहीं बल्कि एक तरह से ‘राजनीतिक’ स्तर की है।

हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के देहावसान के तुरंत बाद आप (सल्ल॰) के उत्तराधिकारी की नियुक्ति के बारे में मुस्लिम समुदाय में दो मत उत्पन्न हो गए। आप (सल्ल॰) के ख़ानदान वालों में से अधिकतर का विचार था कि नेतृत्व और शासन हज़रत अली (रज़ि॰) को मिलना चाहिए। (विदित हो कि वह ज़माना पूरे विश्व में बादशाहत का ज़माना था जिसमें सत्ता शान ख़ानदान के ही किसी आदमी को हस्तांतरित होता था। और हज़रत अली (रज़ि॰), पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) के चचाज़ाद भाई थे)।

बाक़ी लोगों का मत था कि इस्लाम की प्रकृति बादशाहत की नहीं, जनमतीय है (जिसे आजकल जनतांत्रिक, डेमोक्रैटिक कहा जाता है)। इसलिए गुणवत्ता, अनुभव व क्षमता के आधार पर इस्लामी शासक का चयन व स्थापन आम जनता करेगी। फिर हुआ यह कि बहुमत से हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के पहले उत्तराधिकारी हज़रत अबूबक्र (रज़ि॰), उनकी मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी हज़रत उमर (रज़ि॰), उनकी शहादत के बाद उनके उत्तराधिकारी हज़रत उस्मान (रज़ि॰) तथा उनकी शहादत के बाद उनके उत्तराधिकारी हज़रत अली (रज़ि॰) नियुक्त हुए।

हज़रत अली (रज़ि॰) के समर्थक गिरोह को ‘शिआने-अली’ कहा जाने लगा। बाद के वर्षों और सदियों में शिआ मत के विचारों में (राजनीतिक आयाम के साथ-साथ) कुछ वैचारिक, आध्यात्मिक तथा धार्मिक आयाम भी जुड़ गए और इतिहास के सफ़र में ‘शिआ’ एक विधिवत सम्प्रदाय बन गया। इससे पहले शिआ नाम का कोई सम्प्रदाय न था। ‘सुन्नी’नामक कोई सम्प्रदाय भी सिरे से था ही नहीं। बीसवीं शताब्दी में पहचान के लिए वे लोग सुन्नी कहे जाने लगे जो शिआ मत के न थे। विश्व भर में लगभग 90 प्रतिशत मुसलमान इसी मत के हैं।

भारत में अंग्रेज़ी शासनकाल में ‘फूट डालो और शासन करो (Divide and Rule) का चलन ख़ूब बढ़ाया गया और स्वतंत्रता के बाद कुछ पार्टियों और तत्वों ने अपने-अपने राजनीतिक हित के लिए मुसलमानों के बीच इस मामूली से विभेद को बढ़ावा दिया।

अतः सुन्नी व शिआ सम्प्रदायों में टकराव की भी घटनाएं कुछ क्षेत्रों और कुछ नगरों में रह-रहकर घटती रहीं। नादान मुस्लिम जनता (शिआ और सुन्नी आबादी) छिपे हुए शत्रुओं की साज़िश का, रह-रहकर शिकार होती रही। लेकिन दोनों सम्प्रदायों के अनेक अक़्लमन्द, निष्ठावान व प्रबुद्ध रहनुमाओं की कोशिशों से स्थिति में बदलाव और बड़ी हद तक सुधार आ चुका है।

वास्तव में इसका श्रेय ‘इस्लाम’की शिक्षाओं को, इस्लाम के मूलाधार और मूल धारणाओं तथा मूल-स्रोतों (कु़रआन, हदीस) को जाता है।

इस व्याख्या के बाद एक बहुत बड़ा प्रश्न है जो अपना उत्तर चाहता है। यह वर्तमान वैश्वीय राजनीतिक परिदृश्य (Global political scenario) में, और विशेषतः कुछ शक्तिशाली पाश्चात्य शक्तियों (Western political players) के ख़तरनाक ‘न्यू वल्र्ड ऑर्डर’ की उन नीतियों के परिप्रेक्ष्य में बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है जिनके तहत वे शक्तियां मुस्लिम जगत के कई देशों में बदअमनी, झगड़े-मारकाट, फ़ितना-फ़साद, रक्तपात, विद्वेष, अराजकता और गृह-युद्ध (Civil war) फैलाकर वहां अपना राजनीतिक, सामरिक, वित्तीय व आर्थिक प्रभुत्व और नव-सामराज्य (Neo-imperialism) स्थापित करना तथा उन देशों के प्राकृतिक संसाधनों को लूटना, लूटते रहना चाहती हैं।

इसके लिए वह अनेक देशों में ‘शिआ – सुन्नी’ टकराव व हिंसा का वातावरण बनाती हैं। आम लोग जो इस टकराव और हिंसा की वास्तविकता से अनजान हैं (और समाचार बनाने, कहानियां गढ़ने, झूठ जनने और इस सारे महा-असत्य को फैलाने का सूचना-तंत्र-Media Machinery-उन्हीं शक्तियों के अधीन होने के कारण) उनके मन-मस्तिष्क में सहज रूप से यह प्रश्न उठता है कि जब शिआ-सुन्नी एक ही धर्म के अनुयायी, एक ही ‘विशालतर मुस्लिम समुदाय’हैं तो इराक़, सीरिया, ईरान, सऊदी अरब, बहरैन, यमन, पाकिस्तान आदि मुस्लिम देशों में शिओं का शोषण, सुन्नियों के साथ दुर्व्यहार, दोनों का एक-दूसरे की आबादियों, मुहल्लों, मस्जिदों में बम-विस्फोट करना, आदि क्यों है?

इसका उत्तर यह है कि वास्तव में यह सब उन्हीं बाहरी शक्तियों की विघटनकारी ख़ुफ़िया एजेंसियों के करतूत हैं जो मुस्लिम-देशों पर अपने प्रभुत्व, शोषण और लूट का महाएजेंडा (Grand agenda) रखती हैं। पूरा सूचना-तंत्र (Media) या तो उन्हीं का है या उनसे अत्यधिक प्रभावित या परोक्ष रूप से उनके अधीन है, अतः विश्व की आम जनता को न तो हक़ीक़त का पता चल पाता है न उन शक्तियों के करतूतों और अस्ल एजेंडे का।

यह है उस शिआ-सुन्नी विभेद की वास्तविकता जो बहुत ही सतही (Superficial) है; और यह है उस शिआ-सुन्नी विद्वेष की वास्तविकता जो कुछ चुट-पुट घटनाओं व नगण्य अपवादों (Exceptions) को छोड़कर लगभग पूरी तरह नामौजूद (non-existant) है लेकिन इस्लाम के शत्रु और मुस्लिम समुदाय के दुष्चिंतक लोग इसमें अतिशयोक्ति (Exaggeration) करके, इस्लाम की छवि बिगाड़ने तथा मुस्लिम समुदाय के प्रति चरित्र हनन व बदनामी का घोर प्रयास करते रहे हैं। और दूसरे तो दूसरे, स्वयं बहुत से नादान मुसलमान भी इस प्रयास से प्रभावित हो जाते हैं।

नादानी के चलते, अविश्वास व दुर्भावना के गर्म वातावरण का तापमान, साज़िशी लोग जब कुछ और बढ़ाकर कोई चिनगारी भड़का देते हैं तो वह देखते-देखते धधक कर शोला बन जाती है। वर्तमान स्थिति यह है कि मुस्लिम समुदाय इन साज़िशों को समझ कर, सचेत व आत्मसंयमी हो गया है।

शायद 90 फीसद मुसलमान नही जानते की शिया-सुन्नी क्या है, मगर बस दुश्मनी है, जो निभानी है क़ब्र तक, डंडा है जो बजवाना है अपनी पीठ पर क़ब्र में हश्र तक ।

और ठीक यही हाल हिन्दुस्तान में “देवबन्दी” “बरेलवी” और “अहले हदीस”को ले कर है

हिन्दुस्तानी सुन्नी मुसलमान आम तौर से इन तीन फ़िरक़ों में बंटे हुए हैं, और इनके आपस में इख़्तिलाफ़ की वजह से मुसलमानो का दीनी सियासी और समाजी नुकसान कितना हुआ है ये अंदाजा भी नही लगाया जा सकता, इन फिर्को का मानने वाला आम तौर से एक दूसरे का अनजान दुश्मन होता है, चाहे बरेलवी को बरेलवियत के बारे में न पता हो, लेकिन दूसरे अहले हदीस या देवबन्दी मुसलमानसे दुश्मनी के लिए ये काफी है कि वो इन दूसरे फिरक़ो से ताल्लुक़ रखते हैं, ठीक यही हाल मज़कूरा बाकी दोनों फिरके वालों का है।

इन फिरक़ो के बनने की बहुत से कारण बताए जाते हैं, लेकिन मुझे आजतक दोनों तीनो तरफ के पक्ष जानने से सिर्फ इतना समझ आया कि ये हमारे उस दौर के आलिमो की गलती रही है, शुरू शुरू में यहाँ सब सुन्नी थे, अपने आपको हनफ़ी कहलाते थे,मज़हबी एतबार से कोई क़ाबिल ए ज़िक्र तंज़ीम नही थी, जो अलग अलग ज़हन रखने वाले लोगो को कंट्रोल करती, शुरू में थोडा बहुत मसाइल में इख़्तिलाफ़ हुआ ( जो कि हनफ़ी शाफ़ई मालिकी हंबली में भी है, लेकिन ये चारो एक दूसरे को अपनी तरह का मुसलमान जानते है ) अब चाहिए ये था कि जिसको इख़्तिलाफ़ था वो बैठकर सुलझाते, मगर उसपर दूसरी तरफ से पमफिल्ट छापे गए, इश्तिहार तक़सीम हुए, कि देखो जनाब वो आलिम तो मुनाफ़िक़ हो गया, उसने ये बात कह दी, वो दीन से निकल गया, तो जवाब में दूसरी तरफ से भी यही हुआ, बल्की उसने जवाबी हमला और तेज़ ओ तुन्द लहजे में किया।

फिर उसको नीचा दिखाने के लिए इधर से किताब लिखी गई, फिर उधर से किताबी शक्लमें जवाब, इसी तरह दोनों तरफ कुछ छोटे क़द के आलिम अपने अपने पीरों के साथ जाशामिल हुए, और तू काफ़िर में मुसलमान का एक न खत्म होने वाला सिलसिला, कुछ आगे चलकर यूँ हुआ जो जिस शहर में था उसी की तरफ मनसूब होकर मशहूर हुआ, एक मज़े की बात बताऊँ ??

शायद 90 फीसद मुसलमान नही जानते की देवबन्दी बरेलवी क्या है, मगर बस दुश्मनी है, जो निभानी है क़ब्र तक, डंडा है जो बजवाना है अपनी पीठ पर क़ब्र में हश्र तक ।

अभी कुछँ दिन पहले की बात है हम निकाह मेँ शरीक होने के लिऐ एक गाँव गये थे और अल्लाह की मर्जी देखिऐ उसी निकाह मेँ तीन अगल अलग मसलकोँ के मकत्तदी थे तब्लीग से भी सुन्नी दावते इस्लामी से भी काफी तादाद मेँ अहले हादिथ जमात से ताल्लुक रखने वाले भी थे ।

हमारे एक दोस्त ने अस्र के वक्त अजान दे दी अब मासला ये खङा हो गया के जमात करायेगा कौन तभी एक तब्लीग जमात से ताल्लुक रखने वाले दोस्त ने फैज सलफी साहब से इल्तिजा की आप पढा दिजिऐ पर फैज साहब कशमाकश मेँ आ गये अगर इमामत हम कराऐगे तो सुन्नी दावत वाले हमारे पिछे नमाज नही पढेगे और वो लोग बवक्त बजमात दुसरी जमात खङी कर लेगे पर मासला पैचीदा होने से पहले ही फैज सलफी साहब ने माजमे मेँ जोर से कहाँ अगर आप [सुन्नी दावत बरेलवी] मेँ से कोई आलिम है तो वो आगे आऐ और इमामत करवाऐ जनाब एक आलिम आते है और मुस्कुराते हुऐ मुस्साले पर खङे हो जाते है तक्बीर के साथ सब लोग राजीखुशी नमाज पढ लेते है अल्लाह के करम से।

बस इत्तिहाद कयाम करने की सोच होनी चाहिऐ इत्तिहाद खुद कयाम हो जाऐगा :)

ये किस्सा इसलिए सुना रहा हूँ, कि मुसलमान आज भी गुटबाजी मे लगे हुए हैं, और आपस की लड़ाईयों मे धीरे धीरे खुद तबाह होते जा रहे हैं, जैसे दुनिया की गिद्ध नजरों का उन्हें पता न हो,
बेवकूफ़ कहीं के …..




About the Author

Administrator

https://muslimsofindiablog.wordpress.com/


Comments


No comments yet! Be the first:

Your Response



Most Viewed - All Categories


Daily Khabarnama Daily Khabarnama