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बस दुश्मनी है, जो निभानी है क़ब्र तक, डंडा है जो बजवाना है अपनी पीठ पर क़ब्र में हश्र तक ।

देवबन्दी बरेलवी और अहले हदीस, आम तौर से हिन्दुस्तानी सुन्नी मुसलमान इन तीन फ़िरक़ों में बंटे हुए हैं, और इनके आपस में इख़्तिलाफ़ की वजह से मुसलमानो का दीनी सियासी और समाजी नुकसान कितना हुआ है ये अंदाजा भी नही लगाया जा सकता, इन फिर्को का मानने वाला आम तौर से एक दूसरे का अनजान दुश्मन होता है, चाहे बरेलवी को बरेलवियत के बारे में न पता हो, लेकिन दूसरे अहले हदीस या देवबन्दी मुसलमानसे दुश्मनी के लिए ये काफी है कि वो इन दूसरे फिरक़ो से ताल्लुक़ रखते हैं, ठीक यही हाल मज़कूरा बाकी दोनों फिरके वालों का है।


इन फिरक़ो के बनने की बहुत से कारण बताए जाते हैं, लेकिन मुझे आजतक दोनों तीनो तरफ के पक्ष जानने से सिर्फ इतना समझ आया कि ये हमारे उस दौर के आलिमो की गलती रही है, शुरू शुरू में यहाँ सब सुन्नी थे, अपने आपको हनफ़ी कहलाते थे,मज़हबी एतबार से कोई क़ाबिल ए ज़िक्र तंज़ीम नही थी, जो अलग अलग ज़हन रखने वाले लोगो को कंट्रोल करती, शुरू में थोडा बहुत मसाइल में इख़्तिलाफ़ हुआ ( जो कि हनफ़ी शाफ़ई मालिकी हंबली में भी है, लेकिन ये चारो एक दूसरे को अपनी तरह का मुसलमान जानते है ) अब चाहिए ये था कि जिसको इख़्तिलाफ़ था वो बैठकर सुलझाते, मगर उसपर दूसरी तरफ से पमफिल्ट छापे गए, इश्तिहार तक़सीम हुए, कि देखो जनाब वो आलिम तो मुनाफ़िक़ हो गया, उसने ये बात कह दी, वो दीन से निकल गया, तो जवाब में दूसरी तरफ से भी यही हुआ, बल्की उसने जवाबी हमला और तेज़ ओ तुन्द लहजे में किया।

फिर उसको नीचा दिखाने के लिए इधर से किताब लिखी गई, फिर उधर से किताबी शक्लमें जवाब, इसी तरह दोनों तरफ कुछ छोटे क़द के आलिम अपने अपने पीरों के साथ जाशामिल हुए, और तू काफ़िर में मुसलमान का एक न खत्म होने वाला सिलसिला, कुछ आगे चलकर यूँ हुआ जो जिस शहर में था उसी की तरफ मनसूब होकर मशहूर हुआ, एक मज़े की बात बताऊँ ??

शायद सत्तर फीसद मुसलमान नही जानते की देवबन्दी बरेलवी क्या है, मगर बस दुश्मनी है, जो निभानी है क़ब्र तक, डंडा है जो बजवाना है अपनी पीठ पर क़ब्र में हश्र तक ।

अभी कुछँ दिन पहले की बात है हम निकाह मेँ शरीक होने के लिऐ एक गाँव गये थे और अल्लाह की मर्जी देखिऐ उसी निकाह मेँ तीन अगल अलग मसलकोँ के मकत्तदी थे तब्लीग से भी सुन्नी दावते इस्लामी से भी काफी तादाद मेँ अहले हादिथ जमात से ताल्लुक रखने वाले भी थे ।

हमारे एक दोस्त ने अस्र के वक्त अजान दे दी अब मासला ये खङा हो गया के जमात करायेगा कौन तभी एक तब्लीग जमात से ताल्लुक रखने वाले दोस्त ने फैज सलफी साहब से इल्तिजा की आप पढा दिजिऐ पर फैज साहब कशमाकश मेँ आ गये अगर इमामत हम कराऐगे तो सुन्नी दावत वाले हमारे पिछे नमाज नही पढेगे और वो लोग बवक्त बजमात दुसरी जमात खङी कर लेगे पर मासला पैचीदा होने से पहले ही फैज सलफी साहब ने माजमे मेँ जोर से कहाँ अगर आप [सुन्नी दावत बरेलवी] मेँ से कोई आलिम है तो वो आगे आऐ और इमामत करवाऐ जनाब एक आलिम आते है और मुस्कुराते हुऐ मुस्साले पर खङे हो जाते है तक्बीर के साथ सब लोग राजीखुशी नमाज पढ लेते है अल्लाह के करम से।

बस इत्तिहाद कयाम करने की सोच होनी चाहिऐ इत्तिहाद खुद कयाम हो जाऐगा




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History - تاریخ ”जो कौम अपनी तवारीख भूलती है, उसे दुनिया भुला देती है.”


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